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rameshbajpai


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रानी नागमती के कर्णफूल

Posted On: 25 May, 2014  
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प्यार को लघु जिंदगी

Posted On: 21 May, 2014  
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पिऊ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा

Posted On: 18 May, 2014  
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पुलिस लाइन शामियाने से

Posted On: 4 May, 2014  
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कहाँ फागुन का श्रृंगार रस

Posted On: 1 May, 2014  
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मौन हो मुझको पुकारा

Posted On: 26 Apr, 2014  
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पुलिस लाइन में होली

Posted On: 25 Mar, 2014  
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ऋतुराज फागुन लाया है

Posted On: 22 Mar, 2014  
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हे परी लोक की राज कुँअरि

Posted On: 20 Mar, 2014  
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आओ रे कागा मोरी अटरिया

Posted On: 15 Mar, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

हा भागते भागते सुना दुलारी “कटि कंचन काट्यो अली का अर्थ पूछ रही है | जबाब में श्री आकाश जी ने कहा ” दुलारी तुम कहा बाजपेयी जी की पोस्टो के फेर में पड़ती हो ,ये पता नहीं क्या क्या लिखते रहते है | सोना यूं भी काफी महगा है | तुम इलाहाबादी अमरूद खाओ ,मैइनके के फायदे बताता हूँ| सुन कर भी नहीं समझ पाया |कहाँ फागुन का श्रंगार रस कहाँ अमरुद ? भला फागुन किसी सुंदरी को अमरुद के गुण समझने भी देगा | पर मेरी नासमझी उसका करू भी तो क्या ? प्रणाम महोदय ...पर ये कटी कंचन काट्यो अली का अर्थ क्या फिर से श्री आकाश तिवारी जी से ही पूछना पड़ेगा? जय श्री राम ... इस जेठ की तपती दुपहरी में कोई होली तो खेला दे ..हम कोई अर्थ वर्थ नहीं पूछेंगे.....मजा आ गया ...इस चुनाव के गर्म मौसम में जैसे कुछ शीतल बूँदें टपक पडी., सादर

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: rameshbajpai rameshbajpai

गुस्सा ,झगडा ,क्रोध तो ,इस जीवन तक यार | सौ जन्मो तक कम न होगा ,बहना मेरा प्यार | श्रद्धेय बाजपेयी साहब, नमस्कार! क्यों याद दिलाते हैं, आप उन भावुक क्षणों को ..... सचमुच जीवन के भाग दौर में हम अपने पुराने सस्कार को खोते जा रहे हैं ... फिर भी भाई बहन का प्यार आज भी कम से कम दिलों में तो अवश्य ही जिन्दा है! मेरी सहधर्मिणी रोक नही पाती है अपने आप को राखी के दिन अपने भाइयों के पास जाने से, और मेरी दीदियाँ आयें या न आयें राखी भेजकर पूछ तो लेती ही है ... राखी बंधवा लिया था न! ... मिठाई भी खाई थी न! ... उसके बाद मुझे अपने कर्तव्य की याद आ जाती है...... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति दी है आपने इस मंच पर .... आभार और साधुवाद!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: rameshbajpai rameshbajpai

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

प्रिय अशोक जी ......नोजवानो वाला नमस्कारम ! आप अगर मेरी तीसरी आँख से देखे तो पाएंगे की नीचे आदरणीय जे.जे. ने अपना उत्तर दे दिया है ..... आदरणीय वाजपेई जी ......सादर प्रणाम ! आपको मुबारकबाद आपकी मेहनत रंग ले आई और आखिरकार जागरण को आपके द्वारा उठाये गए उचित सवालों का जवाब देने सामने आना ही पड़ा –इससे उनकी चिंता झलकती है + जिम्मेवारी का एहसास होता है + हमारी सुरक्षा और गरिमा+जागरण की गरिमा के कायम रहने की गारंटी भी मिल जाती है ..... अब तो खुश हो जाइए सभी प्रतिकिर्याओ का जवाब देना शुरू कर दीजिए –मेरे को दो बार आशीर्वाद ..... अब आपकी कोई फड़कती हुई रचना भी हो ही जानी चाहिए ...... प्रणाम + मुबारकबाद इस जीत पर

के द्वारा:

आदरणीय रमेश बाजपेयी जी, जागरण जंक्शन मंच पूर्ण रूप से ब्लॉगिंग और ऑन लाइन अभिव्यक्ति की गुणवत्ता और क्रियाशीलता में वृद्धि के लिए सक्रिय है. यही कारण है कि संपादक मंडल द्वारा निरंतर मंच पर प्रकाशित सभी आलेखों और प्रतिक्रियाओं पर गहरी नजर रखी जाती है. आज मंच के सदस्य संख्या में आशातीत वृद्धि हो रही है जिस कारण मंच की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी और भी बढ़ चुकी है और इसे उतनी ही जिम्मेदारी से पूर्ण भी किया जा रहा है. मंच ऐसे ही निरंतर अपनी गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखते हुए साहित्याकाश को समृद्ध करता रहे इसमें आप जैसे प्रबुद्ध लेखको/सदस्यों का सहयोग अपेक्षित है. आपके सुझाव को ध्यान में रखते हुए मंच आवश्यक कार्यवाही करने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि किसी भी गंभीर सदस्य को समस्या का सामना ना करना पड़े. धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

के द्वारा: JJ Blog JJ Blog

आदरणीय बाजपाई जी, शायद आपका आकलन सही प्रतीत हो रहा है मैं तो अभी कुछ दिन पहले ही मंच से जुड़ा हूँ लेकिन मेरा अनुभव भी कुछ आप जैसा ही है कुछ अति उत्साही ब्लागर जाने क्या क्या कह जाते हैं जिससे ऐसा भी प्रतीत होता है कि मंच के संचालकों की विचार धारा भी शायद उन्ही के समर्थन में हो - यहं तक की असभ्य भाषा का प्रयोग भी कुछ लोग करते है और मंच मौन रहता है / वैसे तो यह सर्वविदित ही है कि मंच का संचालक मंडल जागरण समूह ख़ास राजनितिक विचार धारा का समर्थक होने के नाते अपनी पत्रकारिता के नैतिक धर्म को त्याग कर उस पार्टी विशेष के समर्थन में दिन रत लगा रहता है / जिस कारण से समर्थक ब्लागरों का उत्साह और बढ़ जाता है और उसी कि परिणिति में अनर्गल विचारों प्रकटन भी होने लगता है, आपका कथन शही है,

के द्वारा: gareebdass gareebdass

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय वाजपेई जी .....सादर प्रणाम ! नमस्कार ! शुक्रिया ! स्वागत ! आदर ! अभिनन्दन ! और आभार ! वोह शायद अकबर और जोधाभाई पर थी .....उस दिन और उसके अगले दिन भी नेट की स्पीड बहुत ही स्लो थी .... ब्लॉग पेज खुल नहीं रहे थे .... आप बधाई के पात्र है की आपने उस बात को न केवल याद रखा बल्कि उन असमाजिक तत्वों का कुक्र्त्य अपने गरिमामय ब्लॉग के द्वारा सभी के सामने भी ले आये ..... जागरण को भी इस मामले में अपनी चुप्पी को तोड़ते हुए कुछ ठोस और सार्थक कदम उठाने चाहिए .... एक बार हमारे ब्लागर श्री ओ पी पारिक जी कह रहे थे की वोह इस मंच पर कामसूत्र की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे और एस.पी.सिंह जी उनका समर्थन कर रहे थे .... लेकिन मैंने उनको ऐसी झाड़ पिलाई की आज तक उनकी हिम्मत नहीं हुई उस विषय को इस मंच पर उठाने की ..... लेकिन इस बार मैं खुद पर लानत भेजता हूँ की हम समय पर इस के खिलाफ आवाज नहीं उठा सके ... आपका पूर्ण समर्थन करते हुए आपकी आवाज में अपनी आवाज को मिलते हुए इसको जन जन की आवाज बनाने के आवाहन के साथ ..... आपका नालायक पुत्तर न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/11/राजकमल-इन-पञ्चकोटि-महामण/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

परम आदरणीय बाजपेयी जी, आपके आदेश के अनुपालन में वो नज़्म यहाँ पेश कर रहा हूँ जो मेरे दिल के बेहद क़रीब है। पंकज उधास की आवाज़ में सुरबद्ध इस नज़्म का लिंक अभी उपलब्ध नहीं है अतः फ़िलहाल इसी से संतुष्ट होने का प्रयास करें। बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ, याद आती है चौका बासन चिंता फुंकनी जैसी माँ; बांस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे, आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ; चिड़ियों की चहकार में गूंजे राधामोहन अली अली, मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती घर की कुण्डी जैसी माँ; बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में, दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटिनी जैसी माँ; बाँट के अपना चेहरा माथा आँखें जाने कहाँ गईं, फटे पुराने इक अल्बम में चंचल लड़की जैसी माँ; साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

वैसे एक बात इमानदारी से कहूँगा की इस कविता के मर्म को समझने के लिए अनीता पॉल को जानना भी बेहद जरुरी है,मैंने पहली बार इस रचना को पढ़ा तो अच्छी लगी लेकिन अनीता पॉल के जिक्र से मैं जरा चौंक सा गया,लगे हाथों मैंने गूगल पर सर्च भी मारा की ये कौन सी महान विभूति हैं,किन्तु संतोषजनक समाधान नहीं मिला,सौभाग्य से आज राजकमल जी का लेख पढ़ते समय अनीता पॉल जी की टिपण्णी पढ़ी,वहाँ से लिंक पकड़कर उनके ब्लॉग पर गया,कुछ रचनायें पढ़ी,थोडा थोडा उनकी महानता से साक्षात्कार हुआ,और अब जब मैं आपकी कविता को पढता हूँ तो सच कहूं आपकी लेखनी को चूम लेने का मन करता है,इतनी सटीक और सारगर्भित रचना जिस ले में आपने रच डाली है,उसमे गहरे अर्थ निहित हैं,आप निस्संदेह प्रशंसा और वंदन के पात्र हैं.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

प्रिय श्री चातक जी आपकी संवेदनशीलता ,भावनाओ को गहराई से परखने का इश्वर प्रदत्त गुण ,ह्रदय की अतुल्य प्रेम मई सहजता से हम सब भली भाति परिचित है | आपने मेरी व्यथा को महसूस ही नहीं किया बल्कि उसका जीवन्त चित्रण भी कर दिया | आपका यही अंदाज आपके लेखन को गरिमा से भर भी देता है | आपका कथन यह स्पस्ट कर रहा है की बेटियों के लिए पिता की संवेदना कभी कम नहीं होती , व पिता की दृष्टि में सब बेटिया लाडली ही होती है | यहाँ अपने पराये का भेद होता ही नहीं | उनका दर्द ,उनके आंसू पिता के चट्टान से दिल को पिघला देते है | उदारता से दी गयी इस प्रतिक्रिया के लिए मै आपको हार्दिक धन्यवाद देता हु | शुभ कामनाओ सहित

के द्वारा:

आदरणीय बाजपेयी जी, सादर प्रणाम, कविता में कहीं एक गहरा दर्द छिपा है माँ के सीने में एक निहायत कोमल दिल होता है सभी एक स्वयं सिद्ध सिद्धांत की तरह मानते हैं परन्तु इन पंक्तियों में दबा एक पिता का दर्द सोचने पर मजबूर करता है कि क्या इस बात की तुलना हो सकती है कि स्त्री और पुरुष में ज्यादा संवेदनशील वास्तव में कौन है? मैं तो सिर्फ एक निष्कर्ष तक पहुंचा हूँ कि बेटी के लिए एक पिता से ज्यादा संवेदना किसी में नहीं होती| अप्रतिम भाव और वात्सल्य से भरी पंक्तियाँ पढ़कर एक सुखद अनुभूति हुई कि कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है बयान नहीं किया जा सकता| अच्छे भावों द्वारा मार्गदर्शन का धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा:

आदरनीय वाजपेयी जी,, सादर अभिवादन अत्याधिक स्म्योप्रांत आपके मंच पर आने के लिए क्छ्मा प्रार्थी हूँ ,,दरअसल अभी भी आ नही पाता परन्तु अनीता जी के ब्लॉग पर आपने उक्त प्यारी बिटिया को समझाने का प्रयत्न किया था तो वहीं से आपके मंच पर आने की प्रबल इच्छा हुई आपकी उक्त प्यारी बिटिया तो समझने से रही ! उसी दिन मे आपके मंच पर कमेन्ट करने का प्रयाश करता रहा परन्तु कई बार प्रयाश करने के उपरान्त भी कमेन्ट लोड नही हो पाया ,,और उक्त कमेन्ट को मैनेसुरक्छित नही रक्खा था तो आज पुनः उपस्थित हूँ :) आपके काव्य तो हमेशा से ही मन को हर्षित करते रहे हैं आज भी काव्य माधुर्य ने मंच को कृष्णमय कर दिया ....जय हो वृन्दावनचारी गिरिधारी मुरलीधर राधा जीवन की...........................जय भारत

के द्वारा:

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

आदरणीय बाजपेयी जी, नमस्कार बहुत दिनों बाद आपका मंच पर पुनः प्रदार्पण देख हार्दिक खुशी हुई. आपकी काव्य रचनाएं हृदय को प्रफुल्लित करने साथ ही नए ताजगी से भर देती हैं. मंच पर आपके आगमन की आवृति अधिक होने की आकांक्षा के साथ. ..... राम कुमार बहुत दिनों बाद आपका मंच पर पुनः प्रदार्पण देख हार्दिक खुशी हुई. आपकी काव्य रचनाएं हृदय को प्रफुल्लित करने साथ ही नए ताजगी से भर देती हैं. मंच पर आपके आगमन की आवृति अधिक होने की आकांक्षा के साथ. ..... राम कुमार पाण्डेय पा बहुत दिनों बाद आपका मंच पर पुनः प्रदार्पण देख हार्दिक खुशी हुई. आपकी काव्य रचनाएं हृदय को प्रफुल्लित करने साथ ही नए ताजगी से भर देती हैं. मंच पर आपके आगमन की आवृति अधिक होने की आकांक्षा के साथ. ..... राम कुमार बहुत दिनों बाद आपका मंच पर पुनः प्रदार्पण देख हार्दिक खुशी हुई. आपकी काव्य रचनाएं हृदय को प्रफुल्लित करने साथ ही नए ताजगी से भर देती हैं. मंच पर आपके आगमन की आवृति अधिक होने की आकांक्षा के साथ. ..... राम कुमार पाण्डेय

के द्वारा: rkpandey rkpandey

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रमेश सर, कसम से, सच कह रहा हूं, सुबह से मन में सैकड़ों खिन्नताएं लिये नेट पर भटक रहा था, कभी फ़ेसबुक तो कभी कहीं, और फ़िर वापस जंक्शन पर । रविवार का दिन, करूं तो क्या ! आज दाढ़ी भी नहीं बनाता छुट्टी को भरपूर प्राकृतिक रूप से जीने के लिये । हंसी तो चाह कर भी पास नहीं फ़टक रही थी । फ़िर जैसे आपके इस उपसंहार होली कांटेस्ट विशेषांक ने मुर्दाए से मन पर संजीवनी फ़ेर दी, और मेरे मुंह दबाकर हंस पड़ने पर पास ही पढ़ाई में मगन लड़का चौंक कर मेरा मुंह ताकने लगा । आपने मेरे द्वारा अपने व्यंग्य में आपको लपेटने का बदला ले लिया । मुझे लपेटा ही नहीं, बल्कि सतिया को मेरे बंगले पर नचाने की मेरी साध भी पूरी करवा दी । मन गदगद हो गया । लेख का फ़ांट रंगीन और बड़ा किया होता आपने, तो और मज़ा आता । अभी भी एडिट कर अपडेट पोस्ट कर सकते हैं । कांटेस्ट की शुभकामनाएं ।

के द्वारा:

भाई बाजपेयी जी, इतने लोगों के बारे में,कुछ कहना वह भी शब्दों में-बहुत ही श्रम-साध्य कार्य हॆ.जिस व्यक्ति के बारे में कुछ लिखना हो उसकी प्रकृति को पहले समझना पडता हॆ-तभी बात बनती हॆ.आपने होली के अवसर पर उन्हें उपाधियां बांटकर -प्रशंसनीय कार्य किया हॆ.बधाई! मॆं अभी सभी से परिचित नहीं हूं.लेकिन रोशनी,राजकमल शर्मा,अबोध बालक,सचिन व काजल कुमार जी को दी गयी उपाधि बहुत बढिया लगी.लिस्ट कई बार पढने के बाद न तो मुझे अपना नाम नजर आया ऒर न ही आपका.वॆसे भी अपने लिए आप स्वयं उपाधि चुने-यह तो सरासर अन्याय होगा.चलो यह कमी मॆं पूरी कर देता हूं. रमेश बाजपेयी- अंधा बांटे रेवडी,फिर-फिर अपनों को देय. विनोद पाराशर- दिल के अरमा,आंसुओं में बह गये (बुरा ना मानो होली हॆ)

के द्वारा: विनोद Vinod पाराशर Parashar विनोद Vinod पाराशर Parashar

आदरणीय वाजपेयी जी सादर अभिवादन ..... दग्ध हृदय मन व्याकुल है , नव ज्वलन धूम सा दुर्निवार , चेतनता की किरणे डूब रहीं थीं, निर्वासित - निर्विकार, क्या अच्छा ना हो प्राण प्रिये, आ जावो तुम मधुमास लिए, सुरभित लहरों की छाया में ,बुल्ले का विभव विलास लिए , गोधुली के धूमिल पट में तुम ,दीपक सा दीप्त दिखा दो , कुमकुम का चूर्ण उड़ाते तुम ,प्रस्फुटित करो अंतर्मन को , दावानल सा था दहक रहा,तुम जीवन का उल्लास लिए , शशि सी वह सुंदर रूप विभा ,वारिदि का नव प्राण लिए , स्नेहालिंगन की लतिकावों सा,मुझको झुरमुट में आने दो , हे प्राण प्रिये इस दगदग ह्रदय को, विन्द्राबन बन जाने दो,, ........... प्रतियोगिता हेतु कोटिशः शुभकामनाएं ...... जय भारत

के द्वारा: