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अयोध्या इतिहास के आइने में

Posted On: 15 Sep, 2010 Others में

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राष्टीय एकता की आधार शिला को सुद्रढ़ रखने के लिए सामाजिक सौमनस्य एवम सद भाव परम आवश्यक है |देश भक्ति सर्वोच्च धर्म है | राष्ट्र प्रेम मनुष्य के धर्म प्रेम में सम्मिलित होता है |भारत वर्ष संसार का सिरमौर है .अप्रितम पुण्य भूमि और श्रेष्ट धर्म क्षेत्र है . इस देश के अशेष आदर्शो के प्रतिमान भगवान श्री राम ने जननी एवम जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ट बताया है .श्री राम का चरित्र युग युगांतर के अंतर में हजारो वर्षो से भारतीय जनमानस के ह्रदय में अंकित रहा है . संस्क्रत एवम सभी भारतीय भाषाओ के प्रमुख कवियों ने भगवानश्री राम के बारे में कुछ न कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित किये है .

इतिहास के प्रष्ठो पर नजर डालने से यह प्रमाणित होता है की साकेत नाम से विख्यात

इस नगर का गौरवशाली अतीत धर्म ,संयम , एवम अध्यात्म का केंद्र रहा है .प्राचीन
भारतीय साहित्य संसार में बौध ग्रंथो में साकेत के रूप में अयोध्या का महत्व पूर्ण उल्लेख
किया गया है . बुद्ध के समय के छः प्रमुख नगरो में साकेत की गिनती होती थी .विख्यात बौद्ध भिक्षु सारिपुत्र एवम अनिरुद्ध के अयोध्या में ठहरने की बात प्रमाण सहित मिलती
है मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद जिन चार शक्तिशाली प्रशासनिक इकइयो का उदय हुआ उनमे अयोध्या भी एक है .
सम्राट हर्ष वर्धन के राजत्व कालमे सन 629 में चीनी यात्री हुयेनसांग ने अयोध्या की
यात्रा के दौरान यहाँ की वैभव शाली पम्प्राओ एवम नागरिको के स्नेह पूर्ण व्यवहार का वर्णन किया है . इस सम्बन्ध में प्राचीनतम बौद्ध साहित्य में वर्णित तथ्यों की पुष्टि कालांतर में हुयेनसांग के द्वारा होती है .
अयोध्या साम्प्रदायिक एवम धार्मिक संकीर्णता या सामाजिक विघटन करी प्रबत्तियो से अलग , अपूर्व,और अद्वितीय ज्ञान केंद रही है .प्रमाणों की परिधि इस बात को स्पष्ट
करती है की अयोध्या मूलतः मर्यादा पुरुषोतम श्री राम की जन्म भूमि रही है .जिसे बौधो ने वेद बिरुद्ध धार्मिक पुनर्जागरण काल में अपना केंद्र बनाया .राज सत्ता के परिवर्तनों के साथ साकेत में भी परिवर्तनों का दौर चला .
अयोध्या मुस्लिम शासन काल में भी सन १२०६से १८०० तक आद्यात्मिक विरासत की धरोहर बनी रही . भक्ति आंदोलनों के दौरान भी यह अनेक संतो की आराधना स्थली बनी .
वैष्णव भक्ति शाखा के अग्र दूत रामानंदाचार्य की रामोपासना के आदर्शो में लीन साधक . भक्तो की भक्त भूमि अयोध्या ही रही . गोस्वामी तुलसीदास के भक्ति साहित्य की रचना स्थली अयोध्या ही थी . नाभा दासने अयोध्या नगरी से बाहर रह कर भी” भक्तमाल ”
की रचना कर भक्ति परम्परा को अमर कर दिया .तुलसी दास एवम नाभा दास सम कालीन थे. अयोध्या में ही राम भक्ति परम्परा को जारी रखते हुए परम हंस रामसेवक ने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया .
इस प्रकार इतिहास की धरती पर अयोध्या जीवंत भूमिका अदा करती रही है . इसकी ऐतिहासिकता ,राजनीती ,आध्यात्मिक अनुशीलन,एवम वैष्णव भक्ति की अस्मिता से संपन्न रही है . ऋग़ वेद के दशम मंडल में भगवान श्री राम का उल्लेख किया गया है .
यही नहीं समस्त भारतीय वांडमय में राम कथा का वर्णन है तथा श्री राम के दिव्य रूप का बखान है .इतनी प्राचीन व्यवस्था एवम अविछिन्न परम्परा विश्व इतिहास में बहुत कम कथाओ में मिलती है .
इतिहास के ये जीवंत दस्तावेज तथ्यों सहित यह प्रमाणित करते है की भगवान श्री राम ने इस भूमि पर जन्म लिया था .यदि हम राम जन्म भूमि मुक्ति के लिए किये गए प्रयासों के ऐतिहासिक दस्तवेजो की बात करते है तो राम जन्म भूमि मुक्ति के लिए कुषाण काल में शायद पहला संघर्ष किया गया .सन 1033 में सालार मासाद के काल में राजा सुहेल ने दो बार संघर्ष किया . बाबर के शासन काल से लेकर वाजिद अली के शासन काल तक देवी दीन पाण्डेय , रानी जय कुमारी ,गुरु गोविन्द सिंह जी , राजा गुरु दत्त अमेठी, पंडित भवानी दत्त आदि द्वारा चौहत्तर बार संघर्ष किया गया . यही नहीं अंग्रेजी शासन काल में भी 1934 तक सामान्य जनता ने दो बार श्री राम जन्म भूमि मुक्ति हेतु चढ़ाई की .
अब जब न्यायलय का फैसला आने वाला है तो भारत की कोटि कोटि आकंछाओ को न्याय मिलेगा .

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118 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rita singh 'sarana' के द्वारा
September 30, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी , नमस्कार l पहले तो मैं आपसे माफ़ी चाहती हूँ की मैंने अभी तक क्यों आपका लेख नहीं पढ़ा ? आपके इस लेख पढ़कर मेरी बहुत सारी जिज्ञासाए मिटी l शुक्रिया l बधाई स्वीकारे l

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 1, 2010

    रीता जी बधाई के लिए शुक्रिया . हम सब लोग एक ही मंच पर लिख रहे है . तो विचारो का आदान प्रदान होता ही रहता है . इसमें देर जैसा कुछ नहीं है .

kmmishra के द्वारा
September 30, 2010

बाजपेई जी प्रणाम । आपके दिये साक्ष्यों को माननीय उच्च न्यायालय ने भी स्वीकार कर लिया । ये जजमेंट उन कम्युनिस्ट इतिहासकारों के मुंह पर करारा तमाचा है जो न राम को मानते हैं और न राममंदिर को । राम मंदिर संघर्ष के पिछले 500 साल के इतिहास को ये आम भारतीय से छिपा कर बैठे थे । सांप की तरह कुण्डली मार कर । कोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी आपको बहुत बहुत बधाई . jo सत्य है एक दिन सामने आएगा ही इस पोस्ट पर मिले आपके सहयोग के लिए शुक्रिया बहुत छोटा है .बस आत्मा से आशीर्वाद दे रहा हु .

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
September 30, 2010

श्री बाजपेयी जी , नमस्कार l सबसे पहले तो मैं आप से क्षमा मांगती हूँ ,वह इसलिए कि मैंने इतना अच्छा लेख पढने में देर कर दी l दूसरी बात आपकी लेख ने मेरी बहुत सारी जिज्ञासाये मिटा दिए धन्यवाद l बधाई स्वीकारे l

kmmishra के द्वारा
September 29, 2010

प्रिय अमित जी राम तो घट घट में हैं । जीव निर्जीव सभी में राम हैं । इस पूरे ब्राह्माण्ड का निमार्ण ही ईश्वर तत्व से हुआ है । चारों तरफ, सभी दिशाओं में ईश्वर के सिवा और कुछ है ही नहीं । तब क्या ईश्वर ही ईश्वर को मारता है, शिकार करता है, जुल्म ढाता है और प्यार करता है । सृष्टि का निमार्ण ब्रह्म और माया दोनों से मिलकर हुआ है । प्रकृति के अपने नियम हैं और अध्यात्म अपनी जगह है । इंसान गुण और दोष का पुतला है । रहा मंदिर मसला तो रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य हैं । समकालीन मुस्लिम और यूरोपियन इतिहासकारों की एक लंबी लिस्ट है जिसमें राम मंदिर ध्वंस को बाबर के शिया सिपहसालर मीर बाकी के द्वारा बताया गया है । हिंदू संस्कृति सात हजार साल से अधिक पुरानी है । मात्र सौ साल पुराने पुरातात्विक महत्व की इमारतों या क्षेत्र को आक्र्योलोजिकल सर्वे आफ इंडिया संरक्षित घोषित करता है । यूनेस्को भी इसी तरह विश्व भर के तमाम इमारतों और क्षेत्रों को संरक्षित घोषित करता है । सात हजार साल से पुरानी हमारी सभ्यता जो कि अनवरत चली आ रही है । बहुत सी सभ्यताएं जो हमसे बाद में शुरू हुयीं खत्म हो गयीं । हम लगातार चले आ रहे हैं । हमें इस पर गर्व होना चाहिये और इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिये । आप देखिये आज हिंदू संस्कृति पर छिप कर कितने हमले हो रहे हैं । वेटिकन का घोषित उद्देश्य है (तत्कालीन पोप ने सन 2000 में कहा था कि नयी सहस्त्राब्दि में क्रिस्चैनिटी ऐशिया में फैलनी चाहिये ।) आज भारत मे आदिवासी इलाकों – मध्यप्रदेष, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिमोत्तर आदि में पिछले कई दशक में तेजी से ईसाईकरण हुआ है । इसके आलावा बंग्लादेशी घुसपैठियों को जायज नागरिगता प्रदान की जा रही है । यहां तक कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले बंग्लादेशियों के असम में बसने को भारत पर हमला माना था । विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिये देश की कोई नीति ही नहीं है । किससे डरे सहमे हैं देश के नीतिनियंता । हमारी सभ्यता पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं । कम्युनिस्ट इतिहासकार गलत सलत इतिहास दशकों से लिख रहे हैं । ऐसे में अगर हम जरा सी भी अपने इतिहास की बात करते हैं तो उसे तुरंत देश की शांति व्यवस्था से जोड़ दिया जाता है । क्या सहिष्णु होना इतना आत्मघाती होता है कि हम अपने ही देश में अपने इतिहास का जिक्र तक नहीं कर सकते । सहिष्णु होना क्या कायर होना होता है । क्या शांति और भाई चारे की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं की ही है । सच बात को कहने से भी डरने लगे हैं लोग । ये तो वही बात हुयी कि सो जाओ नहीं तो गब्बर आ जायेगा । कुछ लोग कहते हैं कि मंदिर मुद्दे से भी ज्यादा जरूरी दूसरे मुद्दे हैं । विकास है, अशिक्षा है, गरीबी है । मैं पूछता हूं कि क्या राम मंदिर बन जाने से देश पिछड़ जायेगा और न बनने से क्या ये सभी दिक्कते हल हो जायेंगी । ये सब बौद्धिक बहाने हैं अपना पिण्ड छुड़ाने के लिये । अगर देश का विकास और गरीबी मिटाना जरूरी है तो देश की सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखना भी उतना ही जरूरी है । इतिहास को मिटाना, भुलाना, छिपाना भी देश की प्रति एक बड़ा अपराध है । अगर पीढ़ियां अपनी हजारों साल की पहचान ही भूल जायेंगी तब देश को बांधे रखने वाली गोंद भी सूख जायेगी और फिर देश भी नहीं रहेगा । हमें गर्व करने के लिये हमारी ऐतिहासिक पहचान और इतिहास को भी बनाये रखना चाहिये । जय हिंद ।

atharvavedamanoj के द्वारा
September 27, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी मोस्ट viewed ब्लॉगर बनने की हार्दिक शुभकामनाएँ …सत्य के उद्घाटित करने के आपके प्रयास की मैं भूरी भूरी प्रशंसा करता हूँ …वन्देमातरम

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय मनोज जी भाव भरी प्रतिक्रिया पाकर हर्षित हुआ . आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतजार रहता है उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया . बंदेमातरम.

    amit kumar के द्वारा
    September 29, 2010

    jab ram aur rahim bhagwan ke hi do nam hain to ham kisi vishesh nam ko ayodhya ko vishesh akriti me baithane ki jid kyo pakad ke rakhe hai kya hamne is prakar se bhagwan ko pangu nahi bana diya kya uski shakti aur samarthyata ko chunauti nahi di hai.hamne apne swartho ke liye bhagwan ko shaktiheen kar diya hai

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    प्रिय अमित जी राम तो घट घट में हैं । जीव निर्जीव सभी में राम हैं । इस पूरे ब्राह्माण्ड का निमार्ण ही ईश्वर तत्व से हुआ है । चारों तरफ, सभी दिशाओं में ईश्वर के सिवा और कुछ है ही नहीं । तब क्या ईश्वर ही ईश्वर को मारता है, शिकार करता है, जुल्म ढाता है और प्यार करता है । सृष्टि का निमार्ण ब्रह्म और माया दोनों से मिलकर हुआ है । प्रकृति के अपने नियम हैं और अध्यात्म अपनी जगह है । इंसान गुण और दोष का पुतला है । रहा मंदिर मसला तो रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य हैं । समकालीन मुस्लिम और यूरोपियन इतिहासकारों की एक लंबी लिस्ट है जिसमें राम मंदिर ध्वंस को बाबर के शिया सिपहसालर मीर बाकी के द्वारा बताया गया है । हिंदू संस्कृति सात हजार साल से अधिक पुरानी है । मात्र सौ साल पुराने पुरातात्विक महत्व की इमारतों या क्षेत्र को आक्र्योलोजिकल सर्वे आफ इंडिया संरक्षित घोषित करता है । यूनेस्को भी इसी तरह विश्व भर के तमाम इमारतों और क्षेत्रों को संरक्षित घोषित करता है । सात हजार साल से पुरानी हमारी सभ्यता जो कि अनवरत चली आ रही है । बहुत सी सभ्यताएं जो हमसे बाद में शुरू हुयीं खत्म हो गयीं । हम लगातार चले आ रहे हैं । हमें इस पर गर्व होना चाहिये और इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिये । आप देखिये आज हिंदू संस्कृति पर छिप कर कितने हमले हो रहे हैं । वेटिकन का घोषित उद्देश्य है (तत्कालीन पोप ने सन 2000 में कहा था कि नयी सहस्त्राब्दि में क्रिस्चैनिटी ऐशिया में फैलनी चाहिये ।) आज भारत मे आदिवासी इलाकों – मध्यप्रदेष, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिमोत्तर आदि में पिछले कई दशक में तेजी से ईसाईकरण हुआ है । इसके आलावा बंग्लादेशी घुसपैठियों को जायज नागरिगता प्रदान की जा रही है । यहां तक कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले बंग्लादेशियों के असम में बसने को भारत पर हमला माना था । विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिये देश की कोई नीति ही नहीं है । किससे डरे सहमे हैं देश के नीतिनियंता । हमारी सभ्यता पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं । कम्युनिस्ट इतिहासकार गलत सलत इतिहास दशकों से लिख रहे हैं । ऐसे में अगर हम जरा सी भी अपने इतिहास की बात करते हैं तो उसे तुरंत देश की शांति व्यवस्था से जोड़ दिया जाता है । क्या सहिष्णु होना इतना आत्मघाती होता है कि हम अपने ही देश में अपने इतिहास का जिक्र तक नहीं कर सकते । सहिष्णु होना क्या कायर होना होता है । क्या शांति और भाई चारे की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं की ही है । सच बात को कहने से भी डरने लगे हैं लोग । ये तो वही बात हुयी कि सो जाओ नहीं तो गब्बर आ जायेगा । कुछ लोग कहते हैं कि मंदिर मुद्दे से भी ज्यादा जरूरी दूसरे मुद्दे हैं । विकास है, अशिक्षा है, गरीबी है । मैं पूछता हूं कि क्या राम मंदिर बन जाने से देश पिछड़ जायेगा और न बनने से क्या ये सभी दिक्कते हल हो जायेंगी । ये सब बौद्धिक बहाने हैं अपना पिण्ड छुड़ाने के लिये । अगर देश का विकास और गरीबी मिटाना जरूरी है तो देश की सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखना भी उतना ही जरूरी है । इतिहास को मिटाना, भुलाना, छिपाना भी देश की प्रति एक बड़ा अपराध है । अगर पीढ़ियां अपनी हजारों साल की पहचान ही भूल जायेंगी तब देश को बांधे रखने वाली गोंद भी सूख जायेगी और फिर देश भी नहीं रहेगा । हमें गर्व करने के लिये हमारी ऐतिहासिक पहचान और इतिहास को भी बनाये रखना चाहिये । जय हिंद ।

R K KHURANA के द्वारा
September 27, 2010

प्रिय रमेश जी, क्षमा चाहता हूँ कुछ कारन वश मैं मंच पर न आ पाने के कारण आपको बधाई न दे सका ! सप्ताह का ब्लागर बनाने पर तथा एक अच्छा लेख देने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 28, 2010

    आदरणीय भाई जी आपके स्नेह व आशीर्वाद को पाकर हमेशा नयी उर्जा का संचार होता है .देर जैसा कुछ कभी मायने नहीं रखता . बस आपकी उपस्थिति ही काफी है .आपके लिए मंगल कामनाओ सहित

    sugreev gupta के द्वारा
    September 30, 2010

    gggdg

soni garg के द्वारा
September 26, 2010

वाजपयी जी एक अच्छे लेख और साप्ताहिक ब्लोगर बन्ने के लिए बधाई !

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 26, 2010

    सोनी जी हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया . आपके लिए तमाम हार्दिक मंगल कामनाये .

अरुण कान्त शुक्ला \'आदित्य\' \\\\\\\\\\\' के द्वारा
September 25, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी ‘ मोस्ट व्यूड ब्लॉगर आफ दी वीक ‘ बनने के लिये हार्दिक बधाई स्वीकार करें |

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    आदरणीय श्री अरुण कान्त शुक्ला जी , आपकी भाव पूर्ण बधाई से सच मुच भाव विभोर हु यह मुकाम आप सब के सहयोग व शुभ कामनाओ से ही मिला है . रचनाओ पर आपके विचारो सदा स्वागत है आपकी सहमती /असहमति सदा सर माथे पर . बधाई का बहुत बहुत आभार

अरुण कान्त शुक्ला \'आदित्य\' \\\\\\\\\\\' के द्वारा
September 25, 2010

आदरणीय मिश्रजी एवं मुनीश भाई , अंग्रेज और यूरोपीय इतिहासकारों व अन्य अनेक विदेशी यात्रियों के विचारों के बारे में मुझे ज्ञात है | उसके बावजूद , आप लोगों की सलाह के अनुसार मैंने उस साईट को पुनः खोलकर देखा | मेरा सरोकार राम मंदिर वहां रहे होने पर प्रश्न चिन्ह खड़े करना या बाबरी मस्जिद गिराए जाने के ओचित्य या अनोचित्य का विश्लेशण करना नहीं है | मेरा मन्तव्य मात्र इतना है कि किसी भी देश या कौम (समाज) का गौरव, मात्र अतीत के गौरव को पुर्स्थापित करके नहीं बनाया जा सकता | इस प्रयास में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है , उनका ह्रदय ही जानता है | एक बात जो मेरे मन को मथती है , तिरुपति , शिरडी का साईं मंदिर एवं अन्य अनेको जगह जो आम भक्तों के लिये श्रद्धा और पूजा के स्थल हैं , किस तरह कमाई का जरिया बने हुए हैं | यदि आपके पास पर्याप्त पैसा है तो आपको दर्शन जल्दी हो जायंगे , नहीं तो कभी कभी दो दिन भी लाइन में लगना पड़ सकता है | एक तरफ अरबों की सम्पति वाले मंदिर हैं , करोड़ों रुपये की लागत वाले रिहाईशी (मुकेश अम्बानी ) घर हैं और दूसरी तरफ हर ठंड में फुटपाथ पर सोते हुए मरने वाले लोग हैं | यह सच है कि करोड़ों हिंदुओं की राम में आस्था है , पर , उन्हीं करोड़ों में से करोड़ों नहीं तो लाखों भगवान के नाम पर इन्हीं धर्म संस्थानों के सामने भिक्षा (भीख ) माँगते जिंदगी गुजारते हैं | मेरे अनुसार देश या समाज का गौरव प्रजा का खुशहाल होना ही होना चाहिये | हो सकता है मेरी अभिव्यक्ति में त्रुटि हो , पर आप मेरे मंतव्य को अवश्य समझने की चेष्टा करें |

    M.Naim के द्वारा
    September 26, 2010

    Respected Mr. Shukla this is the only very good written column, I found in this area. superb, fantastic and good thinking of Humanity god bless you and Our Greatest INDIA

    kmmishra के द्वारा
    September 28, 2010

    मेरा मन्तव्य मात्र इतना है कि किसी भी देश या कौम, समाज, का गौरवए मात्र अतीत के गौरव को पुर्स्थापित करके नहीं बनाया जा सकता, इस प्रयास में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनका ह्रदय ही जानता है. प्रिय अरूणकांत जी यहां पर मैं श्री नरेश मिश्र जी का कथन प्रस्तुत करना चाहूंगा – जो देश या समुदाय अपने अतीत की संस्कृतिए ऐतिहासिक घटनाओं से वाजिब सबक लेकर वर्तमान को नहीं संवारना चाहता उसका वजूद जल्दी ही खत्म हो जाता है । यूनानए मिश्रए और रोमन सभ्यता का पतन इसलिये हुआ था कि उस सैनिक नजरिये से बेहद ताकतवर संस्कृति का कोई वैभवशाली अतीत नहीं था । तलवार के बल से जो साम्राज्य बनाये जाते हैं वे तलवार की धार से ही टुकड़े .टुकड़े हो जाते हैं । हिंदू संस्कृति के निमार्ण में हिंसा या सैनिक शक्ति की कोयी भूमिका नहीं थी । वह उस वैचारिकए दार्शनिक और सांस्कृतिक बुनियाद पर बनी थी जिसे आज तक सनातन कहे जाने का गौरव हासिल है । हमारे देश में जिन तीन धर्मों का प्रचारए प्रसार हुआ वे मुख्य रूप से हिंदूए बौद्ध और जैन धर्म हैं । इतिहास में ऐसा कोई ठोस उदाहरण नहीं मिलता कि इनमें से किसी भी धर्म के प्रचार के लिये किसी शासक ने या समुदाय ने युद्ध और हिंसा का सहारा लिया हो । तिरुपति ए शिरडी का साईं मंदिर एवं अन्य अनेको जगह जो आम भक्तों के लिये श्रद्धा और पूजा के स्थल हैं ए किस तरह कमाई का जरिया बने हुए हैं द्य यदि आपके पास पर्याप्त पैसा है तो आपको दर्शन जल्दी हो जायंगे ए नहीं तो कभी कभी दो दिन भी लाइन में लगना पड़ सकता है द्य यह सच है कि करोड़ों हिंदुओं की राम में आस्था है ए पर ए उन्हीं करोड़ों में से करोड़ों नहीं तो लाखों भगवान के नाम पर इन्हीं धर्म संस्थानों के सामने भिक्षा ;भीख द्ध माँगते जिंदगी गुजारते हैं द्य आपने जो देखा वह सत्य का एक पहलू है । लाखों करोड़ों लोग न सिर्फ मंदिरों के सामने भीख मांगते हैं बल्कि वे तो आपको ताजमहल, गेट वे आफ इंडिया, ओबराय होटेल और पाश बाजारों मे बड़े बड़े शापिंग माल्स के सामने भी भीख मांगते मिल जायेंगे । जहां तक बड़े बड़े मंदिरों के धन और वैभव की बात है तो भारत सरकार इन मंदिरों की आय पर हैवी टैक्स वसूल कर उसका बहुत बड़ा भाग (लगभग 800 करोड़ रूपये) हज यात्रा के लिये सब्सिडी में बांट देती है जो कि संविधान के मूलाधिकार अनु0 27 की खुले आम अवहेलना है । इसके अलावा ये बड़े बड़े मंदिर इन पैसों से तीर्थस्थानों में धर्मशालाएं, लंगर, संस्कृत पाठशालाएं और दूसरे समाजोपयोगी कार्य भी करते हैं । मैं मानता हंू कि इन बड़े बड़े मंदिरों, मठों के पास अकूत सम्पत्ति है लेकिन यह सम्पत्ति भारत की गरीबी मिटाने के लिये बहुत बहुत थोड़ी है । इन बड़े बड़े मंदिरों के सामने भीख मांगने वालों को दो जून का खाना भी इन्हीं मंदिरों से मिलता है । देश की गरीबी, विकास, शिक्षा, इंफªास्ट्रक्चर मेनटेन करने का काम सरकारों का होता है मंदिरों और अखाड़ों का नहीं । आपको मंदिरों का वैभव तो दिखाई पड़ गया मगर स्विस बैंक में जमा 75 लाख करोड़ रूपये भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और उद्योपतियों की काली कमाई नहंी दिखती है । 77000 करोड़ रूपये केन्द्र और दिल्ली की कांग्रेस सरकार कामनवेल्थ गेम के नाम पर गटक गयी और उसका बोझ सभी टैक्स्पेयर भारतीयों की जेब पर पड़ा और देश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी हुयी, उसकी आपको चिंता नहीं हुयी । यूपीए सरकार ने मंहगाई को एवरेस्ट पर चढ़ा कर आम भारतीय के मुंह से दाल, रोटी, सब्जी का निवाला छीन लिया मगर आपकी नजर मंदिरों में चढ़ते चढ़ावे पर लगी हुयी है । अरूणकांत जी ब्लाग के माध्यम से मंहगाई, भ्रष्टाचार और स्विस बैंक में जमा कालेधन के लिये अलख जगाईये । विश्वास मानिये अगर वह 75 लाख करोड़ रूपये वापस आ गये तो भारत मंे कोई गरीब नहीं रहेगा । इतना पैसा तो गोरे अंग्रेज भी 200 साल में भारत से लूट कर ब्रिटेन नहीं ले गये थे जितना इन काले अंग्रेजों ने लूट कर स्विस बैंक में जमा किया है । आपकी टिप्पणी से एक सार्थक बहस होती है । इसके लिये आपका हृदय से आभारी हूं । जय हिंद ।

    kmmishra के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय अरूणकांत जी यहां पर मैं श्री नरेश मिश्र जी का कथन प्रस्तुत करना चाहूंगा – जो देश या समुदाय अपने अतीत की संस्कृतिए ऐतिहासिक घटनाओं से वाजिब सबक लेकर वर्तमान को नहीं संवारना चाहता उसका वजूद जल्दी ही खत्म हो जाता है । यूनानए मिश्रए और रोमन सभ्यता का पतन इसलिये हुआ था कि उस सैनिक नजरिये से बेहद ताकतवर संस्कृति का कोई वैभवशाली अतीत नहीं था । तलवार के बल से जो साम्राज्य बनाये जाते हैं वे तलवार की धार से ही टुकड़े .टुकड़े हो जाते हैं । हिंदू संस्कृति के निमार्ण में हिंसा या सैनिक शक्ति की कोयी भूमिका नहीं थी । वह उस वैचारिकए दार्शनिक और सांस्कृतिक बुनियाद पर बनी थी जिसे आज तक सनातन कहे जाने का गौरव हासिल है । हमारे देश में जिन तीन धर्मों का प्रचारए प्रसार हुआ वे मुख्य रूप से हिंदूए बौद्ध और जैन धर्म हैं । इतिहास में ऐसा कोई ठोस उदाहरण नहीं मिलता कि इनमें से किसी भी धर्म के प्रचार के लिये किसी शासक ने या समुदाय ने युद्ध और हिंसा का सहारा लिया हो । आपने जो देखा वह सत्य का एक पहलू है । लाखों करोड़ों लोग न सिर्फ मंदिरों के सामने भीख मांगते हैं बल्कि वे तो आपको ताजमहल, गेट वे आफ इंडिया, ओबराय होटेल और पाश बाजारों मे बड़े बड़े शापिंग माल्स के सामने भी भीख मांगते मिल जायेंगे । जहां तक बड़े बड़े मंदिरों के धन और वैभव की बात है तो भारत सरकार इन मंदिरों की आय पर हैवी टैक्स वसूल कर उसका बहुत बड़ा भाग (लगभग 800 करोड़ रूपये) हज यात्रा के लिये सब्सिडी में बांट देती है जो कि संविधान के मूलाधिकार अनु0 27 की खुले आम अवहेलना है । इसके अलावा ये बड़े बड़े मंदिर इन पैसों से तीर्थस्थानों में धर्मशालाएं, लंगर, संस्कृत पाठशालाएं और दूसरे समाजोपयोगी कार्य भी करते हैं । मैं मानता हंू कि इन बड़े बड़े मंदिरों, मठों के पास अकूत सम्पत्ति है लेकिन यह सम्पत्ति भारत की गरीबी मिटाने के लिये बहुत बहुत थोड़ी है । इन बड़े बड़े मंदिरों के सामने भीख मांगने वालों को दो जून का खाना भी इन्हीं मंदिरों से मिलता है । देश की गरीबी, विकास, शिक्षा, इंफªास्ट्रक्चर मेनटेन करने का काम सरकारों का होता है मंदिरों और अखाड़ों का नहीं । आपको मंदिरों का वैभव तो दिखाई पड़ गया मगर स्विस बैंक में जमा 75 लाख करोड़ रूपये भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और उद्योपतियों की काली कमाई नहंी दिखती है । 77000 करोड़ रूपये केन्द्र और दिल्ली की कांग्रेस सरकार कामनवेल्थ गेम के नाम पर गटक गयी और उसका बोझ सभी टैक्स्पेयर भारतीयों की जेब पर पड़ा और देश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी हुयी, उसकी आपको चिंता नहीं हुयी । यूपीए सरकार ने मंहगाई को एवरेस्ट पर चढ़ा कर आम भारतीय के मुंह से दाल, रोटी, सब्जी का निवाला छीन लिया मगर आपकी नजर मंदिरों में चढ़ते चढ़ावे पर लगी हुयी है । अरूणकांत जी ब्लाग के माध्यम से मंहगाई, भ्रष्टाचार और स्विस बैंक में जमा कालेधन के लिये अलख जगाईये । विश्वास मानिये अगर वह 75 लाख करोड़ रूपये वापस आ गये तो भारत मंे कोई गरीब नहीं रहेगा । इतना पैसा तो गोरे अंग्रेज भी 200 साल में भारत से लूट कर ब्रिटेन नहीं ले गये थे जितना इन काले अंग्रेजों ने लूट कर स्विस बैंक में जमा किया है । आपकी टिप्पणी से एक सार्थक बहस होती है । इसके लिये आपका हृदय से आभारी हूं । जय हिंद ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 25, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी सादर नमस्कार,”मोस्ट व्यूड ब्लागर आफ द वीक“ होने पर मेरे तरफ से भी बधाई को स्वीकार करें,धन्यवाद

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय धर्मेश जी भाव भरी प्रतिक्रिया का स्वागत है . बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

chaatak के द्वारा
September 24, 2010

”मोस्ट व्यूड ब्लागर आफ द वीक“ होने के लिये हार्दिक बधाई!

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय चातक जी शुरू से ही आपका उत्साह वर्धन मुझे मिलता आया है . यह मुकाम बिना आपके सहयोग के मुमकिन नहीं था यह प्यार प्रगाढ़ . हो यही आशा है . बहुत बहुत धन्यवाद

sanowar के द्वारा
September 24, 2010

रमेश जी बहुत खूब अच्छा लगा अपनी लेखनी से इसी तरह मार्ग दर्शन करते रहें ”मोस्ट व्यूड ब्लागर आफ द वीक“ होने के लिये हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    सनोवर जी बहुत बहुत धन्यवाद . आशा है आपका सहयोग इसी तरह मिलता रहेगा . आपके अमूल्य विचारो का स्वागत है

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 24, 2010

बाजपेई जी अभिवादन, ”मोस्ट व्यूड ब्लागर आफ द वीक“ होने के लिये हार्दिक शुभकामनाएं ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    सिद्देकुई जी आपकी प्रतिक्रियो से सदा ही बल मिला है भावनाओ का आदर है .बहुत बहुत धन्यवाद

Prasad के द्वारा
September 24, 2010

BADHAI SIRJEE

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रसाद जी आपकी भावनाओ का स्वागत है शुक्रिया

MANAS DAS के द्वारा
September 24, 2010

Congratulation Sir

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    धन्यवाद मनाश जी

Kunal के द्वारा
September 24, 2010

बहुत बहुत बढाई

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    कुनाल जी बहुत बहुत धन्य वाद .

kmmishra के द्वारा
September 24, 2010

बाजपेई जी ”मोस्ट व्यूड ब्लागर आफ द वीक“ होने के लिये हार्दिक शुभकामनाएं । जागरण जंक्शन ने “अयोध्या इतिहास के आइने में ” को चुन कर जनाकांक्षाओं को सम्मान दिया है । एक बार फिर से आपको बहुत बहुत बधाई । आपका कृष्ण मोहन मिश्र ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय मिश्रा जी इस मुकाम तक पहुचने में आपका अमूल्ल्य सहयोग व प्यार ही रहा . मै तहे दिल से जागरण जंक्शन का आभार प्रकट करता हु . जिन्होंने इन ऐतिहासिक तत्थ्यो को प्रकट करने के लिए इस मंच पर अवसर दिया .

आर.एन. शाही के द्वारा
September 24, 2010

बाजपेयी सर बहुत-बहुत बधाई । अनुमान तो पहले से ही था, परन्तु सुबह आपने कुछ बताया नहीं । खोलते ही देखा तो लगा कि रामलला के दर्शन हो गए । योग्य व्यक्ति की योग्य उपलब्धि … एकबार फ़िर ढेर सारी बधाइयां ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    आत्मीय शाही जी बहुत बहुत शुक्रिया . आपकी प्रतिक्रियाये उत्साह वर्धन करती है . aapke प्यार मंगल कामनाये यहाँ तक ले आई . बहुत बहुत धन्यवाद

bkkhandelwal के द्वारा
September 24, 2010

गूपोे ayodhya ram ki maryda purshotam ram hindu hi duniya ke cororon log unke bhakt hain unki vichorn ko bahut se logon ne samay samay per har yug meie unki vichorn ko apanya hai aur dusron ko unkey padh chinhon per chalne ke liye kaha gaya hai na jaaney hamari govt.jab ram ka naam aata hai apni sudh-budhkoh batthti hai ithas meie miei lkha jab jab koi muslam samrat aya hai usney hindu mandiron ko sab se jayada nukasan pahuncha hai issey yeh baat to saaf zahir ho hi jaati yah mandir hi hai na ki babbri , yah baat alag ki koi babbar ko bhi logon ne babbari kaha hai hindu bhi uss samay inkey mukwale kam thhey jo inka saamna kar pattey vasiey bhi hindu samaj jab tak kisi ko nukasn nahi pahuchata jab taak paani sirr ke upper se na gujar jaye kasi yeh congress party ki sarkar hai dushrey per delhi ki ramlilao ke andar munch per jaakar v.i.p.bannkar bhagawan shree ram koe marg per chalney ke liye apne swadon ka uddgarn karti aur dusri taraf jab mandir ka mamla aata hai tab nayaylay meie jakar yah kya fasila leney gayi inko inki karni ka pata ab jab desh meie election aaatta hai b.j.p. ke gohrvirodhi hojatey meie ek baat kahraha hoon ki jab b.j.p.hinduwadi dharm meie astha rakhneywali party hai tab yeh congreess ke neta bhagawan ke charon meie ramlilaon ke andar ja kar kyun jhuktey hain yeh kaise adharmi log hainek taraf hindu dharm ke astha vadilog inhey samperdyktavadi nazar aatey hain aur dusri taraf yeh khud kewal 10 din ke liye ram bhakat hojatey hai behrupiyeh log lalau yadav ko dekhiye ithas ke aainey meie ram janm bhumi ke baarey jab chaha jo bol diya kewal voton ki khatir aur hanumanji ko maantey hain hanumanji ne inhey apna bhakat nahi maana aur asia plata maar desh ke kya bihar kibagdor sambhalney layak bhi nahin rakha kya hoga jo ithas ko jhulta tey hain ram ke hain aur unhi ko bhul jatey hain inhoney ravan ke adarshon ko bhi to nahin maana jisney jiteyji ram naam se virodh kara per marney se pahle muhh se ram ram nikla yeh ithas ka sahi aaina hai lanka meie ram ko sab jaantey hain per ek apna deshapne ithas ke panno se yahan ki sarkar ghabrajiti ki raj na chala jaye sharmm aati hai ithas ke panno se chedd cheadd kartey desh ka barmann bahivsay bachhey aagey ja kar iko kya kahaeyngey hamrai sarkar ko jara bhi sharm hoti to kisi ke upper sampradiyakta aarop nahi lagati jab isski mukti ke mughal rajay se sikh dharm ke guru govind singh ji muslim nawabon ka mukabla kiya ithas ke panno ko congree govt.voton ki bhavnao ko na dekhey ithas ke such ko hazam karey shree ram ke charon meie jaaney ka abhbhi samay hai kya adlat nahi janti yah hindu pradhan desh per desh ki azadi ke samay iss meie ithas ko bataya gaya ki hamara desh swarb dharm hai ussey har hindu manta hai per muslim kyun nahin congree kuch muslim bhaiyon ko chod kar unsey puchey desh ke kanoon se kyun nahi judtey yah baat congree kah nahi sakti khud aag mie ghee dalti hai per ab ithas ko muslam bhi maantey hain ayodhya ke hindu muslam ekta ka roop banney huye hain desh ke musalman bhai in siyasi logon ki chaal se ithas ko nahi jhutla payeyngey koi nahi chhata aaj ek baar grah yud ho woh bhi chhtey shanti se marydonon ka paalan kartey huye ram ji ke mard ko apnaoaur nayayka jo fasila hoga woh hum sab ko manayay hoga jai shree ramithas hindustan ka lamba hai samay samay per jo issko paltagaya ek lambi bahas hai jab samay samay per iss ke liye yaudh huye per kuch logon ne apnei gaddi na jaye ram ko bhulya aaj usi ithas ko dubra lana hoga jao satay hai per tab tak ko rukana hi padega jab tak nayayalay koi marg darashn na dikhey

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    श्री बी के खंडेलवाल जी आपने बहुत ही बिस्तार सहित व्यापक चर्चा करते हुए . अपनी प्रतिक्रिया से रचना को गरिमा प्रदान की है . आपकी भावनाओ का बहुत बहुत स्वागत है .जन जन की आकांक्षाओ व श्रधा से जुडीइन ऐतिहासिक कडियों को जनमानस की आस्था को राजनीती के मकड़ जाल में उलझाना .और राम लीला के समय आस्था का प्रदर्सन . आदि से आपका आक्रोश स्वाभाविक है यकीन रखिये सब कुछ ठीक होगा . बहुत बहुत धन्यवाद , विचारो का सदा स्वागत है

अरुण कान्त शुक्ला \\\\\\\'आदित्य \\\\\\\' के द्वारा
September 21, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी ; आपका लेख निसंदेह ज्ञानवर्धक है | जिन कालखंडों की आपने चर्चा की है , उनमें अयोध्या ही क्यों पाटलीपुत्र , उज्जयनी , वाराणसी , प्रयाग एवं अनेक अन्य नगर अपने वैभव और धार्मिक महत्त्व के लिये आज तक जाने जाते हैं | उसी महत्व और वैभव को पुनः हासिल करने के प्रयास में तो पूरा समाज आदि सामंतकाल में चला जायेगा | इतिहास से अतीत के गौरव को खींचकर लाने से वर्त्तमान का गौरव नहीं बनता | देश में जो लोग ऐसा करना चाहते हैं , उन्होंने वर्त्तमान को कितना कष्टदायी बना दिया है , यह भी अक विचारणीय प्रश्न है | हर काल के शासकों ने इतिहास को न केवल अपने तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्यों के लिये अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा बल्कि अपने हिसाब से लिखवाया भी है | वर्तमान में कोई भी राय बनाने से पहले इतिहास में मंदिरों को तोडने की प्रक्रिया को समझाना बहुत आवश्यक है | क्या मंदिर इसलिए तोड़े गए कि मुसलमान राजा हिदू धर्म का अपमान करना चाहते थे ? हम बहुचर्चित और कट्टरपंथियों द्वारा सबसे ज्यादा हवाला दिए जाने वाले मुहम्मद गजनवी और सोमनाथ मंदिर की चर्चा करें | मुहम्मद गजनवी अफगानिस्तान के गजना नामक शहर से आया था और शायद इसी लिये उसका नाम गजनवी था | गजना से सोमनाथ आने के लिये उसे एक लंबा सफर तय करना पड़ा होगा और निश्चित रूप से रास्ते में बहुत सारे हिन्दू मंदिर पड़े होंगे | उसने उन सब मंदिरों को क्यों नहीं तोड़ा ? रास्ते में बामियान की वशाल बुद्ध की मूर्तियां भी उसे दिखी होंगी , उसने उन्हें हाथ भी नहीं लगाया | पहला सवाल यह उठता है कि उसने तोडने के लिये सोमनाथ मंदिर को ही क्यों चुना ? जब गजनवी सोमनाथ की और बढ़ रहा था तो रास्ते में मुल्तान नाम का शहर पड़ा | मुलतान के नवाब का नाम था अब्दुल फत दाउद | गजनवी ने उससे उसकी सल्तनत की सीमाओं से होकर सोमनाथ जाने की अनुमति मांगी | अब्दुल फत दाउद ने इसकी अनुमति नहीं दी और इस कारण दोनों मुसलमान राजाओं में युद्ध हुआ और इस युद्ध में मुल्तान की जामा मस्जिद शहीद हो गई | याने गजनवी ने अपने राजनीतिक प्रयोजन के लिये रास्ते में आने वाली मस्जिद को भी नहीं छोड़ा | मुल्तान के बाद जो मुख्य शहर पडता था , उसका नाम था थानेश्वर , जहाँ का राजा आनंदपाल था | गजनवी ने उससे भी वही निवेदन किया और आनंदपाल ने उसे अपने राज्य से गुजरने की अनुमति दे दी | अबयः बात तो सभी जानते हैं कि सोमनाथ की अकूट संपदा को उसने लूटा और फिर यह कहकर मंदिर को तोड़ा कि इस्लाम में मूर्ति पूजा को मान्यता नहीं है , इसलिए में मंदिर को तोड़ रहा हूँ | यहाँ प्रश्न उठता है कि अगर वह इस्लाम का सिपाही था तो उसने रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों को क्यों नहीं तोड़ा ? अगर वह इस्लाम का सिपाही था तो उसने अपने रास्ते में आने वाली मस्जिद को क्यों नहीं छोड़ा ? गजनवी की फ़ौज में एक तिहाई सैनिक हिन्दू थे और उसके बारह सिपलसहारों में से पांच हिन्दू थे | उनके नाम थे तिलक , सोंधी , हरजान , राण और हिंद | उसने सोमनाथ जीतने के बाद वहाँ अपने प्रतिनिधि के रूप में एक हिंदू राजा की नियुक्ति की और अपने नाम के सिक्के चलाये जिनकी लिखावट संस्कृत में थी | कमेन्ट लंबा हो रहा है इसलिए में रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास का हवाला देते हुए अपनी बात खत्म करूँगा कि उसी काल में तुलसीदास अयोध्या में ही रहते थे | अगर राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई होती तो निश्चित रूप से तुलसीदास इसका जिक्र अपनी रचनाओं में करते | एक और छोटी किन्तु महत्वपूर्ण बात है कि अभी भी बहुतायत में हिन्दू परम्परा के अनुसार स्त्री अपने पहले बच्चे को जन्म देने के लिये मायके जाती है , तब सीता भी गईं होंगी | और तो और आज भी अयोध्या में ऐसे लगभग पचास से ज्यादा मंदिर हैं जो यह दावा करते हैं कि राम का जन्म वहीं हुआ था | गोस्वामी तुलसीदास के बारे में एक रोचक जानकारी है कि उन्होंने राम कथा को पहली बार आम बोलचाल की भाषा अवधी में लिखा |चूंकि उस समय ब्राम्हण वर्ग केवल देवभाषा संस्कृत का प्रयोग करता था , और तुलसी दास ने उसके विपरीत जाकर अवधी (लोकभाषा) का प्रयोग किया , इसलिए उन्हें जाती से निकाल दिया गया और उनके राम मंदिर आने पर रोक लगा दी गई | पर इस रामभक्त ने अपनी भक्ति को जारी रखने के लिये किसी ढाँचे को ध्वस्त नहीं किया और एक मस्जिद में रहने लगे | तुलसीदास ने अपनी आत्मकथा विनय चरितावली में लिखा है ; तुलसी सरनाम गुलाम है राम को , जाको रुचे सो कहे वोहू माँग के खइबो मस्जिद माँ रहिबो , लेबे का एक न देबे का दोऊ

    rajesh gupta advocate के द्वारा
    September 22, 2010

    अब यह मामला अदालत की सीमा से परे हैं ६० साल लग गए फैसले की तारीख नियत करने में , राम मंदिर केवल राम की मर्यादा के अनुकूल ही बन सकता हैं चाहते सब हैं मगर दिल बड़ा करने में ही हल निकल सकता हैं मंदिर के नाम पर पुरे देश में तनाव का वातावरण बना दिया हैं क्या आम आदमी का इससे कोई सरोकार हैं क्या अक्षरधाम भय मंदिर नहीं हैं.हमें कुच्छ अलग हटकर सोचना होगा

    kmmishra के द्वारा
    September 23, 2010

    श्रद्धेय अरूणकांत जी आपकी टिप्पणी इतिहास के अधूरे ज्ञान और गलत साक्ष्यों पर आधारित है । आपकी टिप्पणी में दिये गये गलत ऐतिहासिक तथ्यों पर पूरी एक पोस्ट तैयार है जो कि जल्दी ही प्रकाशित की जायेगी । तब तक आप “अयोध्या इतिहास के आईने में (भाग २)” में दिये गये ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर फरमायें । इसके अलावा मनोज कुमार सिंह मयंक की पोस्ट “मंदिर – जो तोड़ दिये गये” पर भी गौर फरमायें । आपका कृष्ण मोहन मिश्र ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    श्री अरुण कान्त जी मेरे लेख “अयोध्या इतिहास के आइने मे ” पर आपकी व्यापक और विस्तृत प्रतिक्रिया मिली . मेरे मित्र और विद्वान् श्री के .म . मिश्रा जी भी त्तथ्यो तथा इतिहास की चर्चा की है . आगे अगर किसी तरह की शंका रह गयी हो उसका समाधान करने का प्रयास करुगा ,इस विषय इतनी रूचि और व्यापक चर्चा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    आदरणीय मुनीश जी बहुत बहुत आभार आपकी गरिमा मई उपस्तिथि ने पोस्ट को रोचकता दी है आपके बहुमूल्य विचारो का सदा स्वागत है

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    श्रद्धेय अरूणकांत जी आपकी उपरोक्त टिप्पणी के उत्तर में कृपया आप मेरी पोस्ट ”गुजरात के नाथ“ पढ़े । आभार ।

    M.Naim के द्वारा
    September 26, 2010

    superb

dushyant agarwal के द्वारा
September 21, 2010

अयोध्या इतिहास के आइने में achii जानकारी दी gayee hai निश्चित रूप से इसी इतिहास ko ध्यान में rakhakar यदि faisalaa होता hai तो अच्छा रहेगा परन्तु इसकी उम्मीद kam ही हे वैसे इस विवाद ka हल फिलहाल तो संभव प्रतीत नहीं होता.

    rameshbajpai के द्वारा
    September 21, 2010

    श्री दुष्यंत जी आपको अयोध्या की इतिहास अच्छा लगा .और आपने प्रतिक्रिया दी , शुक्रिया अब तो न्यायलय का फैसला आने ही वाला है . श्री राम सब ठीक करेगे . इसी आशा के साथ

jagojagobharat के द्वारा
September 20, 2010

राम जन्म भूमि पर लेख के लिए कोटि कोटि धन्यवाद .

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 21, 2010

    श्री मान जी अयोध्या के ऐतिहासिक तथ्योको बल प्रदान करने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद

Krishan Kumar के द्वारा
September 19, 2010

Lekh Dil ko Chhune Wala Hai Kash Ke uper Wala In Netao ko Thodi Si Buddhi de de Aur dharam Ke Naam Per Ye Roti Sekna Chhod De Shri Ram Ke Charitr Per Ungali Uthana Ya Itihas Ko Todmarod kar Pesh Karna Apne Desh Aur Dharam Ke Sath Gaddari Karne Ke Saman Hai Jo Kabhi Maf Nahi Ho Sakta. Yadi Kisi Ko Panah Dene Ka Sila Ram Janam Bhumi Jaisa Milta Hai To Hame Apne Dharam ke Beech Se Udarwad Ko Nikal Kare Fekna Hoga .Vase To Aajkal Jhute Ka Bolbala Hai Aur Sachche Ka muh Kala Hai Lekin Fir Bhi Hame Apni Nayay Palika Per Bharosa Hai Ki Vah Itihas Ko Jhutha Nahi Hone Degi Aur Jo Such Hoga Vahi Hoga.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 19, 2010

    श्री कृष्ण कुमार जी आप की भावनाओ का अभिव्यक्ति का और अपनी सांस्क्रतिक विरासत के लिए जज्बे का बहुत बहुत स्वागत है मर्यादा पुरुषोतम श्री राम से प्रेम व न्याय पालिका पर आपका बिस्वास सराह नीय है . आपकी प्रतिक्रिया से बहुत बल मिला है . आपका कथन पूर्ण तयः सत्य होगा . और जो सच होगा वही सामने आ जायेगा . .बहुत बहुत धन्यवाद

vijendrasingh के द्वारा
September 18, 2010

बाजपाई जी नमस्कार …….बहुत ज्ञानवर्धक लेख के लिए धन्यवाद …….मेरी आकांशा है की अब ताजमहल पर भी बहस होनी चाहिए असल में वहां है क्या …? वो मुमताज महल है या भगवान् शिव का मंदिर…………?

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 18, 2010

    विजेंद्र जी अयोध्या इतिहास के आईने में .पर आपकी प्रतिक्रिया मिली .बहुत बहुत धन्यवाद. आपके सुझाव पर भी प्रयत्न करुगा . बहुत बहुत धन्यवाद

    WASEEMURREHMAN के द्वारा
    September 23, 2010

    VIJENDERJI app jase logo sa hi desh ma unmad phalta ha

nikhil के द्वारा
September 17, 2010

बढ़िया जानकारी दी है आपने धन्यवाद

    rameshbajpai के द्वारा
    September 18, 2010

    प्रिय निखिल जी अयोध्या इतिहास के आईने में आपको अच्छी लगी और आपने प्रतिक्रिया दी . बहुत बहुत धन्यवाद

nitindesai के द्वारा
September 16, 2010

आदरणीय बाजपाई जी, प्रणाम. आपके ज्ञानवर्धक और सारगर्भित लेख के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

    rameshbajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय श्री नितिन जी मर्यादा पुरुषोतम श्री राम की जन्म स्थली के ऐतिहासिक तत्थ्यो पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया मिली .बहुत बहुत धन्यवाद

Kunal के द्वारा
September 16, 2010

भगवन राम की नगरी को नमन

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    अयोध्या पर आपकी भावभीनी प्रतिक्रिया मिली बहुत बहुत धन्यवाद

RASHID के द्वारा
September 16, 2010

अयोध्या पर विस्तृत जानकारी के लिया शुक्रिया,, यदि वास्तव में वहां पहले मंदिर था और उसको तोड़ कर मस्जिद बनायीं गयी है तो यह जायज़ नहीं है ,, इस्लाम में जोर ज़बरदस्ती या किसी की जगह पर क़ब्ज़ा करने की इजाज़त नहीं है !! मेरी प्रार्थना है कि इस मुद्दे का कोई ऐसा हल निकल आये जिससे देश में अच्छा माहौल बने और हिन्दू मुस्लिम एकता को बल मिले !!! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    kmmishra के द्वारा
    September 16, 2010

    आमीन । राशिद भाई मेरी भी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यह मुद्दा बिना देश में अशांति फैलाये, बिना किसी राजनैतिक पार्टी को कोई मौका दिये दोनो पक्ष आपस में एक दूसरे की भावनाओं को सम्मान देते हुये सुलझा लें । वैर भाव और कटुता से कुछ भी हासिल न होगा । रहना हम सब को इसी देश में है । आपकी सुलझी हुयी टिप्पणी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद ।

    rajesh gupta advocate के द्वारा
    September 22, 2010

    अब यह मामला अदालत की सीमा से परे हैं ६० साल लग गए फैसले की तारीख नियत करने में , राम मंदिर केवल राम की मर्यादा के अनुकूल ही बन सकता हैं चाहते सब हैं मगर दिल बड़ा करने में ही हल निकल सकता हैं मंदिर के नाम पर पुरे देश में तनाव का वातावरण बना दिया हैं क्या आम आदमी का इससे कोई सरोकार हैं क्या अक्षरधाम भय मंदिर नहीं हैं.हमें कुच्छ अलग हटकर सोचना होगा this is for the first time i am sending my comments

    rajesh gupta advocate के द्वारा
    September 22, 2010

    आप की टिपण्णी बेमिसाल हैं और आम आदमी की आवाज हैं मगर धरम के नाम पर राजनीती करने वालो को इससे क्या मतलब . वोह तो चाहते हैं यह मुद्दा जिन्दा रहे और नफरत की आग में उनकी रोटी सिकती rahe 

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 23, 2010

    राजेश जी आपकी अभिव्यक्ति व पहली प्रतिक्रिया का स्वागत है .मै मिश्र जी से गुजारिश करुगा की वे आपको अपने विचारो से अवगत कराए. धन्यवाद

    Anand Bhardwaj के द्वारा
    September 24, 2010

    Dhanyawad, rashid bhai, ki aap aisa sochte hai hum sabo ko ek hona hoga ye neta log humlogo ko aapas me lara ke apni roti sakte hai,inko kooi mauka nahi dena chayie …….

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    श्री आनंद भरद्वाज बहुत बहुत धन्यवाद .आपने सामजिक एकता को पुष्ट करती हुई विचारधारा से हमारा मनो बल बढाया है . विचारो का सदा स्वागत है

K M Mishra के द्वारा
September 16, 2010

बाजपेई जी प्रणाम । आज पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को इस्लामी सभ्यता कह कर वहां की इतिहास की पुस्तकों में पढ़ाया जाता है । लगता है वैसा ही झूठ हमारे यहां के तथाकथित इतिहासकार भी बोलने पर उतारू हैं । वो न राम को मानते हैं और न ही राममंदिर को । जबकि सन 2004 में आक्र्योलोजिकल सर्वे आफ इंडिया ने जब विवादित परिसर की खुदाई की थी तब उसको वहां पर अलग अलग कालखण्ड के तीन मंदिरों के अवशेष मिले थे । सबसे पुराना मंदिर गुप्तकालीन था । इस्लाम के झंडाबरदारों ने भारत में हजारों मंदिरों को तोड़ा था और उन्हीं मंदिरों के अवशेषों से ही उस जगह मस्जिदों का निमार्ण किया गया । हम उन हजारों मंदिरों की भी बात नहीं करते । राममंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। वह मक्का मदीना नहीं है । चाहे राम कहो या रहीम उपासना तो उसी ईश्वर की ही होनी है । मगर देश के धार्मिक इतिहास को भी तो शतप्रतिशत शुद्ध रूप मे जनता के सामने पेश किया जाना चाहिये । अगर मुस्लिम भाई वह परिसर हिंदुओं को सौंप देते हैं तो यह हिंदू मुस्लिम भाई चारे की एक बहुत बड़ी मिसाल होगी । इससे प्रेम सौ गुना बढेगा ही घटेगा नहीं । एक नहीं दस मस्जिद हमसे बनवा लें मगर वह जमीन हमें लौटा दें । विवाद से दोनो का ही नुक्सान होगा । अंत मंे मैं उन लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं जो उस जगह पर अस्पताल, स्कूल वगैरह बनाने की बात करते हैं । आप लोगों को भारत देश के इतिहास से खेलने और उसे तोड़ने मरोड़ने का हक किसने दिया है । क्या इतिहास को उसके शुद्धरूप में नहीं होना चाहिये । राम भारत की संस्कृति हैं । इस तरह की विचारधारा के लोग किसी इस्लामिक देश में होते तो अब तक पत्थर मार कर मार डाले गये होते जहां माइनारिटीज़ को न वोटिंग राइट होता है और नही कोई मानवाधिकार । भारत में पैदा होने का ये यही सिला दे सकते हैं ये लोग ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी आपकी सारगर्भित साक्ष्यो सहित बिस्तृत व्यख्या पढ़ कर मन बहुत प्रसन्न हुवा .जहा तक भवन श्री राम को न मानने वालो की बात है .तो भारतीय जन मानस की आस्था में वे इस तरह से घुले मिले है की उनको अलग करना असम्भव है .रामचरित मानस में गो स्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है” राजा राम अवध रज धानी ,गावत गुन सुर मुनि बर बानी’ वर्तमान समय में मोहनदास कर्म चंदगाँधी ने सूराज में राम राज की बात कही थी .पर उन स्वनाम धन्य चाटु कारो को इन सब से क्या लेना देना . आपकी ओजस्वी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 16, 2010

    आदरणीय मिश्र जी मेरे पास एक सूची है जिसमे हिंदुस्तान के विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न शासकों द्वारा विभिन्न कालखंडों में तोड़े गए करीब ९०० मंदिरों का एतिहासिक साक्ष्य है. लेकिन इन्हें प्रमाणिक कौन मानेगा? हम और आप जैसे लोग तो सांप्रदायिक और रूढ़िवादी समझे जाते हैं| श्रीमान वाजपेयी जी keep it up

    rameshbajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय मनोज जी अतीतके उस काल खंड के ऐतिहासिक साक्ष्य बिलकुल प्रमाणिक है . जानकारी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    kmmishra के द्वारा
    September 16, 2010

    मनोज भाई नमस्कार । एक बात जो मुझसे छूट गयी थी वह ये है कि तमाम मस्जिदें जो कि मंदिरों के तोड़े गये अवशेषों से ही बनी है इसलिये उनकी बनावट में शिल्प में महीं न महीं मंदिर का वह भाग आ ही जाता है । यहां तक कि बहुत सी मस्जिदों में तो वह पत्थर साबूत लगे हैं जिन पर संस्कृत में उस प्राचीन मंदिर या उस देवी देवता की महिमा में कोई श्लोक लिखा है । हम उन तमाम मंदिरों की भी बात नहीं करते लेकिन गलत इतिहास लिख कर और पढ़ा कर आप एक सनातन देश के सांस्कृतिक इतिहास को मिटाने पर तुले हुये हैं । मंदिर मुद्दा सिर्फ आपसी बातचीत से हल हो सकता है और इसके लिये बिना किसी राजनीति के दोनो पक्षों को एक दूसरे की भावना का सम्मान करते हुये किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिये ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 16, 2010

नमस्कार बाजपेयी जी, बहुत जबरदस्त तरीके से पेश किया है इस प्रभु श्री राम जी के नगरी को,धन्यवाद

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय धर्मेश जी रचना आपको पसंद आई और आपने प्रतिक्रिया दी बहुत बहुत धन्यवाद

arun के द्वारा
September 16, 2010

अयोध्या पे आपने बहुत ही ज्ञान्बर्धक लेख प्रस्तुत किया है. अगर मैं अपने घर में किसी को कुछह दिन रहने दूँ और बाद में वो यह कहे की ये घर हमारा है तो क्या मैं उदारनीति अपनाकर अपना घर छोड़ दूँ ( क्योंकि हमलोग उदारवादी हैं, हमारा धर्म सबको सामान रूप से देखता है ). ये तो सिर्फ हमारी कायरता होगी. बिडम्बना यही है की अपनी प्रिय बस्तु को लेने के लिए न्यायलय के आदेश का इन्तेजार करना होगा .

    rameshbajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    अयोध्या पर आपकी ओजस्वी प्रतिक्रिया मिली . आपकी भावनाओ का आदर है .चुकी मामला न्यायलय के आधीन है और फैसला आने वाला है. इसी लिए इंतजार करना ठीक है

Ramesh bajpai के द्वारा
September 16, 2010

मेरे प्रिय राज कमल जी अयोध्या के इतिहास पर आप की प्रतिक्रिया मिली .आपके हर रंग में कुछ तो ऐसा होता है जो काबिले तारीफ होता है . लेकिन राज कमल जी अयोध्या से श्री राम को अलग नहीं किया जा सकता . बहुत बहुत धन्यवाद

rajkamal के द्वारा
September 15, 2010

ऐ काश की तेरी नज़र मेरी भी नज़र होती …. आदरणीय वाजपाई जी … वैसे मेरी यह दिली तम्मना है की वहाँ पर एक चार मुख्य धर्मो का चार दरवाजो वाला भव्य और आलिशान धार्मिक स्थान हो ….. वेसे आप का यह लेख दूसरे विषय पर है ..लेकिन हमको यह बिमारी है की हम जान बुझ कर एक सही और अलग प्रयास को भी अपनी खुद की तरफ से अलग रंगत देने की कोशिश करते रहते है … आदत से मजबूर

    ranjit singh के द्वारा
    September 24, 2010

    rajkamal ji aap sahi hain ak aam adami ko santi chahiyain na ki mandir/maszid .kuch samaj kain logo nai tanav pada kiya or iska woho phayda uthana chahatae hain

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    श्री रंजीत सिंह जी विचारो यहाँ प्रस्तुत करने का शुक्रिया . आपका कथन बिलकुल सत्य है आम आदमी शांति चाहता है . और कुछ लोग तनाव बढ़ा कर उसका गलत फायदा उठाना चाह रहे है . प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . आपके बहुमूल्य विचारो का सदा स्वागत है

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 15, 2010

सर आपको एक तथ्यपरक लेख के बधाई …..

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय शैलेश जी अयोध्या का इतिहास आपको पसंद आया और आपने कमेन्ट दिया बहुत बहुत धन्यवाद

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 15, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी, राम जन्‍मभूमि, राम की, और फैसला भी राम ही करेंगे और राम के हक में ही करेंगे। बहुत अच्‍छा आलेख था हिन्‍दू होते हुए भी हम अपने इतिहास से अनजान थे। ऐसी जानकारी के लिए आप का बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    आदरणीय श्री जोशी जी आपकी भाव भरी प्रतिक्रिया ने बहुत आनन्द दिया .आपकी सच्ची भावना सच हो जाय, राघव जी से यही प्राथना है . भगवान श्री राम सब . मंगल करे . बहुत बहुत आभार

Munis Dixit के द्वारा
September 15, 2010

जय श्री राम, आदरणीय बाजपेयी जी, एक बेहतर आलेख के लिये धन्‍यवाद।                

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय मुनीश जी भगवान श्री राम कीनगरी अयोघ्या पर लिखा लेख आपको अच्छा लगा .और आपने प्रतिक्रिया दी बहुत बहुत धन्यवाद . जय श्री राम

shishusharma के द्वारा
September 15, 2010

बाजपेयी जी,जिस भूमि का सम्‍बध पुरूशोत्‍तम राम से हो,जिसके लिये युगों से संघर्ष किया गया हो।वो मिलनी चाहिये,लेकिन इसमें कुछ स्‍वार्थी लोंगों ने जानबूझकर इस मुद्दे को विवाद का रूप दे दिया है।अभी भी इस पर राजनैतिक लाभ लेने की पूरी कोशिश की जायेगी।क्‍या आस्‍था को हमारा कानून सुलझा पायेगा,मेरी नजर में,नहीं। आपका सारगर्भित लेख के लिये धन्‍यवाद।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    श्री शिशु शर्मा जी  रचना पर आपकी आस्था भरी प्रतिक्रिया मिली . आपकी बात बिलकुल सही है . दुःख तो इसी बात का है की इसे विवाद का रूप देकर राजनीती की रोटिय सेकी जारही है . कोटि कोटि जन अकांक्षाओ की आस्था से जुडी इस नगरी को न्याय मिलेगा .यह बिस्वाश मन में है बहुत बहुत धन्यवाद

    sugreev gupta के द्वारा
    September 30, 2010

    pawan

Prasad के द्वारा
September 15, 2010

अयोध्या पर अच्छा लेख

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय प्रसाद जी रचना आपको अच्छी लगी और आपने प्रतिक्रिया दी बहुत बहुत धन्यवाद

MANAS DAS के द्वारा
September 15, 2010

बहुत अच्छा

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय मानश जी अयोध्या की ऐतिहासिकता पर लिखा गया लेख   आपको अच्छा लगा और आपने प्रतिक्रिया दी बहुत बहुत धन्यवाद

Partho के द्वारा
September 15, 2010

जय श्री राम

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    प्रिय पार्थो जी बहुत ही भक्ति अवम आस्था से आपने अपने उदगारों को लिखा है . बहुत बहुत धन्यवाद

rkpandey के द्वारा
September 15, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी, एक बेहतर आलेख के लिए बधाई. पावन नगरी अयोध्या का मूल इतिहास उधृत करके आपने बहुत अच्छा किया.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    प्रिय श्री पांडेय जी मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम की नगरी के ऐतिहासिक लेख पर आपकी ह्रदय ग्राही प्रतिक्रिया बहुत मूल्यवान है बहुत बहुत dhanyvad

nishamittal के द्वारा
September 15, 2010

मान्यवर बाजपयी जी,अयोध्या पर इतनी गहन व सप्रमाण जानकारी प्रदान की है ,जिससे हम सभी का ज्ञान बर्धन हुआ होगा.धन्यवाद. हाँ बंधुवर तिवारी जी का विचार मुजको कुछ सही नहीं लगा.हिन्दू धर्म से अधिक सर्वधर्म समभाव वाला शायद कोई और धर्म नहीं,ये सब जानते हैं,परन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं की हमारे किसी भूखंड या मकान पर कोई अधिकार कर ये कहे की यहाँ मेरा भी अधिकार है और हम कहदे ठीक है तुम भी यहीं रहो. यदि न्यायालय के निर्णय के अनुरूप पुष्ट प्रमाणों से सिद्ध होता है की जनम भूमि राम की ही है,(यद्यपि ये तो स्वयं प्रमाणित है जैसा की बाजपाई जी ने बताया है).तो फिर विवाद क्यों?हाँ यदि फिर भी कुछ विचार्भिन्न्ता है तो समाधान शांति व प्रेम से होना चाहिए.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    बहन निशा जी आपकी प्रतिक्रिया व मूल्यवान उदगार बहुत महत्व पूर्ण है अयोध्या की वंदना करते हुए गोस्वामी तुलसी दास जी कहते है बंदउ अवध पुरी अति पावनि ,सरजू सरि कलि कलुष नसावनि बहुत बहुत dhanyvad

R K KHURANA के द्वारा
September 15, 2010

प्रिय रमेश जी, अयोध्या के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद फैसला कुछ भी हो हमें हर हाल में शांति बहाए रखनी चाहिए और मामला सद्भाव से निपटाना चाहिए खुराना

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    आदरणीय भाई जी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार . अयोध्या का इतिहास आपको अच्छा लगा यह इनाम पाकर मै खुश हु .हमें हर हल में शांति और सदभाव को बनाये रखना है आपके आशीर्वाद की आकांक्षा सहित

Piyush Pant के द्वारा
September 15, 2010

अयोध्या पर इतना सारा ज्ञान देने के लिए शुक्रिया………… उम्मीद है राम का नाम यूँ ही अनंत काल तक लोगों में जीवन संचार करता रहेगा……….. राम पर आपके इस लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई………………

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    प्रिय पियूष जी” मर्यादा पुरूसोतम श्री राम का नाम आनंत काल तक लोगो में जीवन संचार करता रहेगा ” आपकी इस भावना को प्रभु श्री राम पूर्ण करे . प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 15, 2010

श्री बाजपाई जी. आपने अयोध्या के बारे में हमें जो जानकारी दी उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.मगर सर इस मामले में मेरी अलग राय है जो मै आप से व्यक्त करना चाहता हूँ…हमारा धर्म सर्व धर्म सम्भाव वाला है इस देश में सभी धर्म पूरे सम्मान के साथ एक साथ रहते हैं फिर ये मन्दिर और मस्जिद का विवाद कैसा जिस जमीन पर राम मन्दिर बनाने के लिए लोग प्रतिबद्ध हैं पहले वो इसका जवाब दें. उसी जमीन पर एक साथ मन्दिर और मस्जिद दोनों का निर्माड होना चाहिए.कोई भी धर्म या इंसान को इस मसले पर ये न लगे की हमें हिन्दुस्तान में न्याय नहीं मिला.बल्कि कोर्ट को तो ऐसा फैसला करना चाहिए की पूरा विश्व अचंभित हो जाए.मगर इसमें हम सब को साथ देना पड़ेगा चाहे वो कोई भी धर्म का हो..ये मेरी निजी राय है अगर मेरे विचार किसी को बुरे लगे तो मै छमाप्रार्थी हूँ.. आकाश तिवारी

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    प्रिय आकाश जी आप ने बहुत ही शिष्टता से आपना पक्ष रखा है .आपने कहा है की हमारा धर्म सर्व धर्म सम भाव का है .बिलकुल सही है . हमारे यहाँ हिदू धर्म तो ऐसा धर्म है जिसने सब धर्मो को सदा आदर सम्मान दिया है . मेरे लेख में अयोध्या के इतिहास का वर्णन है .मै नहीं समझता की इस से किसी का अनादर हो सकता है .

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    September 15, 2010

    सर आपने तो जानकारी दी है तो किसी को क्यों बुरा लगेगा. मैंने अपना एक पक्ष रखा था जिसपर आपकी राय चाहता था . आपका आकाश तिवारी

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    अयोध्या के ऐतिहासिक तथ्यों पर किसी भी प्रश्न पर शालीन बहस हो सकती है इसमें कही खच भी गलत नहीं है आखिर आपकी जिज्ञासा भी तो शांत होनी चाहिए . धन्यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
September 15, 2010

बाजपेयी सर बहुत विस्तृत और ऐतिहासिक तथ्यों को समाहित करता भगवान श्री राम की अयोध्या का आपका वर्णन अपने आप में एक सम्पूर्ण दस्तावेज़ जैसा लगा । आशा है भविष्य में आपकी इस प्रकार की और भी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    शाही जी पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ,इतने विस्तार से लिखने का कारण मर्यादापुरुशोतम श्री राम की अयोध्या से अनन्यता ही है यद्यपि गोस्वामी तुलसी दास जी ने इस पर विस्तार से लिखा है पर यहाँ मैंने प्रमाणिक इतिहास ही लिया है शाही जी बहुत बहुत धन्यवाद

chaatak के द्वारा
September 15, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी, अयोध्या के इतिहास के बारे में इतना विस्तृत लेख अयोध्या को समझने के लिए काफी जानकारी भरा है| सनातन संस्कृति में राज्य और राज्य की संरचना का विशेष महत्व है इसी वजह से अयोध्या में उत्खनन के दौरान पाई गई वस्तुओं को कसौटी पर कसे जाने पर काफी दिलचस्प तथ्य सामने आये हैं यदि इनका जिक्र अदालत के फैसले में किया जायेगा तो आपके लेख में लिखी कई बातें वहां भी लिखी नज़र आएँगी| जानकारी bhare लेख पर बधाई!

    chaatak के द्वारा
    September 15, 2010

    कृपया ‘बहरे, मिटा कर ‘भरे’ करें.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 15, 2010

    चातक जी रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मभूमि के बारे मेंस्वयं उनके श्री मुख से निकले शब्दों को लिखा है सुनु कपीश अंगद लंकेशा ,पवन पुरी रुचिर यह देसा . जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, वेद पुरान विदित जगु जाना . अवध पुरी सम प्रिय नहि सोऊ, यह प्रसंग जनाई कोउ कोऊ , जन्म भूमि मम पुरी सुहावनि,उत्तर दिसि बह सरजू पावनि…….. हरसे सब कपि सुनिप्रभु बानी , धन्य अवध जो राम बखानी . तो अयोध्या को श्री राम से किस प्रकार अलग किया जा सकता है चातक जी बहुत बहुत आभार


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