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यह कैसा भारत महान

Posted On: 15 Aug, 2011 में

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वह जर्जर काया बेबस थी

भ्रष्टाचारी अभिमानी था

कल निगल गयी थी भूख जिसे

वह भी एक हिनुस्तानी था

क्यों नहीं खौलता खून आज

जब तंत्र हुआ है बेलगाम

यह कैसा मद सत्ता का

यह कैसा भारत महान ||

यह कैसा सुराज आया सुभाष

गाँधी यह कैसी आजादी

हे वीर शिवा, हे राणा प्रताप

यह देश हुआ हल्दी घाटी

अपनों पर अपनों का कोड़ा

कब तक लेगा यह अस्थि दान

आगे बढ़ थामो मसाल

वापस लो अपना स्वाभिमान ||

यह धरा कृष्ण ,बलराम ,राम की

गूंजे थे गौतम के विचार

जो सत्य ,अहिंसा के पोषक थे

सिख लाया जग को सदाचार

उस गौरव शाली अतीत का

आज करे फिर से गुणगान

राष्ट्र भक्ति का दीप जला कर

सब बोले जय हिंदुस्तान ||

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Harish Bhatt के द्वारा
August 23, 2011

आदरणीय वाजपेयी जी सादर प्रणाम. बहुत ही शानदार कविता. कोशिश तो यही है कि आगे बढ़ थामेगे मसाल, वापस लायेगे अपना स्वाभिमान ||

rajkamal के द्वारा
August 19, 2011

हमारे गौरवशाली अतीत ने हमको विश्वगुरु था बनाया ….. लेकिन अफ़सोस की अब वैसा चरित्र हमने है गवाया …(पूरी तरह नहीं ) प्रणाम ृचरणवंदना

nishamittal के द्वारा
August 16, 2011

ईश्वर करे सभी के हृदय में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना हो.

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 17, 2011

    आदरणीया निशा जी इन उदगारो का बहुत बहुत शुक्रिया |

ashvinikumar के द्वारा
August 16, 2011

आदरणीय वाजपेयी सादर अभिवादन ,,,यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः अभ्रियुथान्यम सृजाम्यहम सम्भवामि युगे यगे ,,आपकी पूरी रचना केवल यही संदेश दे रही है ,,,कृष्ण हमारे अन्दर हैं वह विचार हैं भावना हैं प्रेरणा हैं स्थितियों का परिवर्तन तो हमे ही करना है पथप्रदर्शक वह थे हैं और रहेंगे ,,लेकिन ध्रितराष्ट्र को वह न दिखाई दिए न ही दिखाई देंगे ,,,,,,,,,जय भारत

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 17, 2011

    “यत्र योगेश्वरः कृष्णो ,यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र शिर्विज्यो भूतिर्ध्रुवा ,नितिर्मतिमर्म | स्नेही श्री अश्विनी जी मन अगाध उर्जा से देने वाले मुरली मनोहर दुरात्मा ध्रतराष्ट को कैसे दिखाई देते | मन का मालिन्य अहंकारी को वह सहज भाव उत्पन्न करने ही नहीं देता | इस लिए विजय अर्जुन को ही मिलती रहेगी | बहुत बहुत शुक्रिया |

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 18, 2011

    “श्रीविर्जयो ” मन को अगाध पढ़े

chaatak के द्वारा
August 15, 2011

आदरणीय श्री बाजपेयी जी, दिलों में टीस उठाती और अपने स्वर्णिम अतीत को याद दिलाती इस रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें!

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 16, 2011

    स्नेही श्री चातक जी वह सुनहरा अतीत जब हमारा देश सोने की चिड़िया कह लाता था | संस्कारो ,आदर्शो त्याग की धरती , | सब कुछ बदल गया | इन सम्मोहक उदगारो के लिए हार्दिक धन्यवाद |

Arunesh Mishra के द्वारा
August 15, 2011

लयबद्ध तरीके से देशभक्ति के विचरों को रोपने के लिए साधुवाद – जय हिंदुस्तान…

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 16, 2011

    प्रिय श्री अरुणेश जी बहुत बहुत शुक्रिया ,इन उदगारो के लिए | जय हिंदुस्तान |

surendra shukla Bhramar5 के द्वारा
August 15, 2011

कल निगल गयी थी भूख जिसे आदरणीय बाजपेयी जी देश प्रेम से भरी यह प्यारी रचना सुन्दर सन्देश देती आह्वान करती की लोगों जागो जलता हुआ घर देखो इससे पहले सब खाक हो जाये खुद भी गर्म हो अपने खून में उबल लाओ – इसी पर मेरी रचना थी काहे खून तेरा प्यारे अब खौलता नहीं …………………बधाई हो वह भी एक हिनुस्तानी था क्यों नहीं खौलता खून आज जब तंत्र हुआ है बेलगाम

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 16, 2011

    प्रिय श्री शुक्ल जी बिलकुल ठीक कहा आपने हम सिफ तमाशबीन बन कर अपनी आजादी की रक्षा नहीं कर सकते | हमें लोगो के जले हुए घरो को बचाना होगा | बहुत बहुत शुक्रिया |

    surendra shukla Bhramar5 के द्वारा
    August 18, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी जैसा की कहा गया है –भ्रष्ट चोर -को चोर कहें न पर आप की जोशीली प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में – साहित्य समाज का दर्पण है हम आप सब भला इससे कैसे बच सकते हैं हमारा आप का कबूतर तो यही है हमारे सभी लेखक मित्रों मीडिया कवी और रचनाकारों से आग्रह भी है की वे सम सामयिक पर भी बहुत ध्यान दें हमारा वर्तमान हमें हमारा सुरक्षित भविष्य देगा जिसका बहुत कुछ बीत चुका है वह अपने बच्चों और अगली पीढ़ी का तो ध्यान करे – बहुत ही शानदार जानदार प्रतिक्रिया आप की जोश बढ़ाने और सब को जगाने के लिए आप के जज्बे को सलाम -जय हिंद शुक्ल भ्रमर 5

abodhbaalak के द्वारा
August 15, 2011

तब और अब …… हम क्या थे और अब क्या हो गए हैं….. क्या वास्तव में हम आज़ादी का अर्थ समझते हैं? सुन्दर रचने , सोचने पर विवश करती …

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 16, 2011

    प्रिय श्री अबोध जी बिलकुल सही कहा आपने आजादी को हमने अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित कर लिया है| बहुत बहुत शुक्रिया |

Santosh Kumar के द्वारा
August 15, 2011

आदरणीय रमेश जी ,..सादर प्रणाम राष्ट्र की समस्त भावनाएं समेटे बहुत ही ओजस्वी रचना ,. बहुत आभार उस गौरव शाली अतीत का आज करे फिर से गुणगान राष्ट्र भक्ति का दीप जला कर सब बोले जय हिंदुस्तान || जय हिंद ,वन्दे मातरम

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 16, 2011

    प्रिय श्री संतोष जी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद | जय हिंद |


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