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आओ रे कागा मोरी अटरिया

Posted On: 15 Mar, 2014 Others में

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  1. काहे री फागुन की बैरिनि बयरिया ,रहि-रहि छेड़ति मोहि |

पोर -पोर देहिया में अगिया लगावति ,थामे थमे नहीं देहि |
कुहू-कुहू कुहकति       काहे री              कोयलिया रहि -रहि अमंवा कि डार |
आजु तोरी बोलिया नीकि न लागै,लागै न नीका दुवार |                                   मन का अंगनवा सजन बिन सुना ,नीका न लागै सिंगार |
आओ रे  कागा मोरी अटरिया ,तोरी बलइया लेउ |
पियवा के आवन खबरि मंगावो ,दूध-भात तोहि देऊ |
छोटकी ननदिया मारे री ताना .फागुन में भाई बिदेश |
भौजी री तोरी ये मोहनी सुरतिया , सईया कसत परदेस |
छिटकी ई फागुन की चटकी अंजोरिया ,पिय बिन मनवा अंधेर |

मोरे बलमवा फागुन का बिरहा , काटे- कटै न मोर |





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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 19, 2014

आदरणीय श्री बाजपेयी जी, – मन का अंगनवा सजन बिन सुना ,नीका न लागै सिंगार | बहुत ही सुन्दर लाइन दिल को छू गयी.. मेरी नजरे आप सबको खोज रही थी और आज आप मिल ही गए.. उम्मीद करता हूँ आप पहले से भी बहुत अच्छे होंगे =आकाश तिवारी=

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    March 20, 2014

    प्रिय श्री आकाश जी फागुन के उल्लास में दिल का सूनापन बेदना देता है | आपकी पोस्ट का इंतजार है |

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 20, 2014

    माफ़ी चाहता हूँ श्री बाजपेयी जी..मैंने अपना पोस्ट 18 मार्च को ही पोस्ट कर दिया था..आपके अगले पोस्ट कि प्रतिच्छा रहेगी.. =आकाश तिवारी=

jlsingh के द्वारा
March 16, 2014

विरहिन की वेदना को प्रस्तुत करती सुन्दर रचना, आदरणीय बाजपेयी साहब !

    rameshbajpai के द्वारा
    March 20, 2014

    प्रिय श्री जवाहर जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद | फागुन का रंग वियोग में बहुत दुःख दायी होता है |


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