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मौन हो मुझको पुकारा

Posted On: 26 Apr, 2014 Others में

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तुम प्यार का घट मधुर शीतलता लिये |

प्यास का मै उष्ण मरुथल प्रिये |

जलज पत्ते पर पड़ी ,तुम ओस की बूंदो सरीखी |

औदार्य की माधुर्य की ,तुम झील हो मीठी |

तृप्ति की तुम झिलमिलाती प्यारी किरन |

मरीचिका में फंसा मै प्यास से ब्याकुल हिरन |

तुम ज्योत्स्ना से नहायी भावनाओ की छाँव |

मै भटकता ढूढ़ता हूँ प्रिये तेरा गांव |

मै पपीहे सा पिय – पियू रटता रहा |

स्वाति का अमृत कलस अन्यत्र झरता रहा |

बिरह का मै हूँ बवंडर ,सिंधु का मै जल हूँ खारा |

हाय फागुन मास में तुमने मुझे कुछ यूँ पुकारा |

नेह को आतुर नयन पा गए कुछ यूँ किनारा |

बोलती उस दृष्टि ने जब मौन हो मुझको पुकारा |

[ प्रवास की वजह से फागुन की रचनाये पोस्ट नहीं कर पाया अतः कुछ पोस्टो में ही सब समेटने का प्रयास कर रहा हूँ ]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
May 5, 2014

आदरणीय भाई जी सादर अभिवादन , सुन्दर शब्दों से सुसज्जित उत्कृष्ट रचना पढ़कर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई मौन की भाषा मुखर होती है

jlsingh के द्वारा
May 1, 2014

बिरह का मै हूँ बवंडर ,सिंधु का मै जल हूँ खारा | हाय फागुन मास में तुमने मुझे कुछ यूँ पुकारा | नेह को आतुर नयन पा गए कुछ यूँ किनारा | बोलती उस दृष्टि ने जब मौन हो मुझको पुकारा | आदरणीय बाजपेयी साहब, मौन रहकर नयन की भाषा को तो सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है विलम्ब से ही सही स्तरीय रचनाओं का मान हमेशा बना रहता है…सादर!


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