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कहाँ फागुन का श्रृंगार रस

Posted On: 1 May, 2014 Others में

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मै सर पर पैर रख कर भाग रहा था | अभी पुलिस लाइन से बाहर निकल ही रहा था कि हुकुम सिंह का चश्मे -नूर मेरी तरफ आता हुआ नजर आया |
“पंडित – चू ……… माई ने फ़ौरन आपको हकारा है ,”
“आसमान से गिरा खजूर में अटका ” मुझ पर लागू होने वाला था | पर दिमाग पर जोर लगाया तो हल यह निकला कि बच्चा है कुछ दे कर जान छुड़ा लू | सो पांच का नोट निकल कर मनोजवा की तरफ लहराया | “बेटा कलुवा गरमा गरम जलेबियाँ तल रहा है , जाकर खालो | माई को बोलना आज जरुरी काम है फिर कभी मिल लूंगा “|
नोट देख कर मनोजवा का चेहरा खिल उठा | झपट्टा मार कर नोट को जेब के हवाले कर बोला ” पंडित चू पैसे तो मैं रख लेता हूँ ,पर चलना आपको अभी पड़ेगा |
अब करता भी क्या ? मन मार कर उसके साथ हो लिया |
“पंडित जी आप भी थे शामियाने में ” ?कचौड़ी हाथ में लिए हवलदारिन सा ने प्रश्न दागा |
उनकी भंगिमा से लग रहा था कि अगर जल्दी से उनके प्रश्न का जबाब न मिला तो वे कचौड़ी को कड़ाही के बजाय
मेरे मुह पर ही तल देगी |
“जी -जी भाभी जी ” मैं हकलाया| ” तो भागे कहा जा रहे हो ? जाओ शामियाने में वहां कि सारी रपट सच सच बताना , समझे | आखिर फिर शामियाने का रुख करना ही पड़ा |
पर पर दुलारी भी तो वहां होगी ही ,उस से कैसे निपटूगा ?
शामियाने की भीड़ में श्री आकाश तिवारी इलाहाबादी अमरुद दुलारी की तरफ उछाल रहे थे ,वह भी हस-हस कर बड़ी अदा से अमरुद कैच कर रही थी | श्री जवाहर जी दोनों की हौसला आफजाई कर रहे थे |वाह क्या कैच है , जोर लगा के आकाश भैया ……… आगे बढ़ा तो देखा हवालदार सा तन्मय होकर गा रहे थे “पद्मावत में लिख्यो जायसी
सुन्नरि तेरा बखान ,सुनो सुनो हे सुनो सुन्नरी नैना मारे बान “| तभी ताई ने मुट्ठी में
इत्र मिला गुलाल निकल कर हुकुम सिंह पर फेका तो पूरा पंडाल गुलाब की खुसबू से महक उठा |” वाह ताई सबको गमका दिया ” | भांग का असर ताई पर भी था |
उन्होंने हुकुम सिंह का हाथ पकड़ कर ठुमका लगाया फिर अलापा ” बाँके सिपहिया से आँख लड़ी गुइया ,मैं बिचारी पलंग पे बैठी झाड़ू मारे
सैया “| कुछ आगे का सुन पाता कि मनोजवा मेरे कान में फुसफुसाया ” पंडित चू माई झाड़ू लेकर इस तरफ ही आ रही है | बस मित्रो मै जो नौ -दो- ग्यारह हुआ सो हुआ |
हा भागते भागते सुना दुलारी “कटि कंचन काट्यो अली का अर्थ पूछ रही है | जबाब में श्री आकाश जी ने कहा ” दुलारी तुम कहा बाजपेयी जी की पोस्टो के फेर में पड़ती हो ,ये पता नहीं क्या क्या लिखते रहते है | सोना यूं भी काफी महगा है | तुम इलाहाबादी अमरूद खाओ ,मैइनके के फायदे बताता हूँ| सुन कर भी नहीं समझ पाया |कहाँ  फागुन का श्रंगार रस कहाँ अमरुद ? भला फागुन किसी सुंदरी को अमरुद के गुण समझने भी देगा | पर मेरी नासमझी उसका करू भी तो क्या ?

[पंडित चाचू के बदले मनोजवा पंडित चू कहता है ]

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 6, 2014

सुन्नरि तेरा बखान ,सुनो सुनो हे सुनो सुन्नरी नैना मारे बान “| तभी ताई ने मुट्ठी में इत्र मिला गुलाल निकल कर हुकुम सिंह पर फेका तो पूरा पंडाल गुलाब की खुसबू से महक उठा.. बदला हुआ अंदाज …भाई मजा आ गया ..हम भी यही कहेंगे ..कहाँ फागुन का श्रंगार रस कहाँ अमरुद ? भ्रमर ५

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 7, 2014

    प्रिय श्री शुक्लजी फागुन की रस भरी फुहार से आपको आनंद मिला जानकर अच्छा लगा | अगर दुलरी से मिलने की इच्छा हो तो कहियेगा , फागुन अभी बाकि है | शुभकामनाओ सहित

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 7, 2014

    ह हा कहाँ भाग्य में लिखा है बाजपेयी जी की दुलरी और प्यारी साथ में रहे हम तो ठहरे बंजारे …जल से कल कल छल चल बहते चलो आभार आप के स्नेह के लिए भ्रमर ५

alkargupta1 के द्वारा
May 5, 2014

आदरणीय भाई जी , पढ़कर बहुत आनंद आया आज बहुत दिनों बाद यहाँ आई और आपकी यह रचना पढ़ने को मिली बहुत अच्छा लगा

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 6, 2014

    आदरणीय बहन आपकी प्रतिक्रिया पाकर सचमुच बहुत अच्छा लगा | शुभकामनाओ सहित

jlsingh के द्वारा
May 1, 2014

हा भागते भागते सुना दुलारी “कटि कंचन काट्यो अली का अर्थ पूछ रही है | जबाब में श्री आकाश जी ने कहा ” दुलारी तुम कहा बाजपेयी जी की पोस्टो के फेर में पड़ती हो ,ये पता नहीं क्या क्या लिखते रहते है | सोना यूं भी काफी महगा है | तुम इलाहाबादी अमरूद खाओ ,मैइनके के फायदे बताता हूँ| सुन कर भी नहीं समझ पाया |कहाँ फागुन का श्रंगार रस कहाँ अमरुद ? भला फागुन किसी सुंदरी को अमरुद के गुण समझने भी देगा | पर मेरी नासमझी उसका करू भी तो क्या ? प्रणाम महोदय …पर ये कटी कंचन काट्यो अली का अर्थ क्या फिर से श्री आकाश तिवारी जी से ही पूछना पड़ेगा? जय श्री राम … इस जेठ की तपती दुपहरी में कोई होली तो खेला दे ..हम कोई अर्थ वर्थ नहीं पूछेंगे…..मजा आ गया …इस चुनाव के गर्म मौसम में जैसे कुछ शीतल बूँदें टपक पडी., सादर

    rameshbajpai के द्वारा
    May 1, 2014

    प्रिय श्री जवाहर जी बात तो आप की सही है इस बार फागुन ही दगा दे गया ,मुझे बाहर जाना पड़ा सो कुछ पोस्ट नहीं हो पाया | रही ” कटि कंचन काट्यो की बात तो अब फागुन बीत चुका है इस लिए बस इतना जान लीजिये की ” कटि [ श्रृंगार रस की नवोढ़ा नायिका की कमर ] को कहते है [ आप सभी से क्षमा याचना सहित ] को कहते है | बाकी अगले फागुन समझा दूंगा |


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