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पिऊ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा

Posted On: 18 May, 2014 Others में

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हवलदारिन सा से अब बर्दास्त नहीं हो रहा था ,पर मन की बात कहे तो कहे कैसे ? हवालदार सा तो अपने में ही मगन है | त्यौहार का दिन है आज राजा- परजा सभी तो रबड़ी खाते है ,कही ख़त्म हो गयी तो ? हाय राम ; आखिर हिम्मत कर पुकार ही लिया ” अजी सुनते हो : “
“क्या बात है ” आत्मा की सारी मिठास वाणी में घोल कर मुस्कराते हुए हुकुम सिंह नजदीक पहुंचे |
“तनी बताओ तो मनोजवा के बाऊ जी तुम्हार हमार पहली मुलाकात कहा भयी रहे?”
“पर उसे इस वक्त याद करने की का जरुरत पड़ गयी “|
“तो बताओ ना”
“तुम्हरे बापू के घर पर ही तो मिले थे , जब तुम जलपान के पिलेट पकरे पकरे हमार सामने आई थी |
“ना मनोजवा के बापू न पहिली मुलाकात गंगवा हलवाई की दुकान में हुयी रहे ,अरे यही कलुवा का बाप रहे गंगवा |
“तो “
“तो ” का उस दिन रबड़ी का एकै कुल्हड़ बचा रहे ,जिसका पइसा पहिले ही हम गंगवा चाचा का पकड़ा दीन रहे . मगर ना वर्दी की रुआब मा तुम हंगामा मचाई दियो तो हम कहा की
“सिपाही जी हुल्लड़ मत करो चाहो तो हम आधी रबड़ी तुमका बिना पइसा के खिला देब “|
बस हमरी बात में तुम इस कदर मोहे इस कदर मोहे की हमार घर के चक्कर काटि – का टि…के ,,,,,,, आखिर हमार बापू से . हमार हाथ मांग ..लिया ………….| तो तो आज तुम वह कुल्हड़ भी अपनी रबड़ी के साथ मंगा कर मुझे खिलाओ “|
हुकुम सिंह मुस्कराये | ” ठीक है मनोजवा के माई तुम घर चलो हम अब्बै भेजित है “|
“मगर तनी जल्दी आना हमार होली तो अभी बाकि है न “
हवलदारिन के जाते ही हुकुम सिंह ने ताई को खोजना शुरू किया तो पता चला वो जा चुकी है | मायूस हो वे खुद कलुवा के यहाँ से रबड़ी ले कर घर पहुंच गए |
दुलारी अमरुद पकडे पैर पटकती पंडित जी के घर पहुंची |
” अजीब आदमी है आप |आप का लिखा कोई ठीक से बांच भी नहीं पाता”|
“क्या हुआ दुलारी जी सब ठीक तो है” मै सकपकाया |
“क्या ठीक है आपके आकाश भईया फागुन में श्रृगार रस के बजाय सुन्दर कमसिन कन्या को अमरुद के गुणसमझा रहे थे | आप इस तरह की बात क्यों लिखते है ?
“मगर ऐसा क्या लिख दिया मैंने दुलारी जी “
” वो कटि को कंचन ……… हुंह मुझे लाज आती है “
” अच्छा कनक छरी सी कामिनी कटि काहे को क्षीन “
कटि कंचन को काटि बिधि कुचन मध्य धरि दीन ‘
“हा हा पंडित जी यही तो कह रहे थे जवाहिर भईया “
“ठीक है दुलारी जी अब समझ लिया है तो घर जाओ ताई परेशान होगी |
“अभी कहाँ ? पहिले होली तो खेल ले ” |
“ठीक है दुलारी जी ,पर यह बात किसी से कहना नहीं कि पंडित जी हमारे साथ होली खेले थे | “सिर्फ इसी शर्त पर कि आप पदमावत की व्याख्या मुझे समझायेंगे “
मरता क्या ना करता हा कर दी है | सोचता हू नागमती -वियोग वर्णन से शुरू करूँगा |
नागमती चित उर पथ हेरा | पिऊ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ||

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 23, 2014

    प्रिय श्री योगेन्द्र जी हार्दिक धन्यवाद |

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 22, 2014

वो कटि को कंचन ……… हुंह मुझे लाज आती है “ ” अच्छा कनक छरी सी कामिनी कटि काहे को क्षीन “ कटि कंचन को काटि बिधि कुचन मध्य धरि दीन ‘ अब तो और गूढ़ होता जा रहा है समझना ..तो दुलारी जी पद्मावत और नागमती वियोग में क्यों न उलझ जाएँ ..मनोरंजक कथा भ्रमर ५

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 23, 2014

    प्रिय श्री शुक्ल जी अब तो आप उलझ ही गए ,दुलारी इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगी | सुलझाने को तैयार रहिये | शुभ कामनाओ सहित

chaatak के द्वारा
May 21, 2014

सुआ काल होइ लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ ॥ बहुत खूब !!!! परन्तु हवलदारिन के जाने और दुलारी से आने के बीच की कड़ी नही खोज पाया ||| :D

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 22, 2014

    प्रिय श्री चातक जी बिलम्ब के कारण कुछ आगे बढ़ गया हू|पर नागमती विरह के बाद आपकी मुलाकत के बाद की कड़िया अब अगली होली पर आएगी | आपका संवाद साहित्यिक होगा | शुभ कामनाओ सहित


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