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प्यार को लघु जिंदगी

Posted On: 21 May, 2014 Others में

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कुछ खबर अपनी सुनाओ

हाल अपना तुम बताओ

ग्रीष्म में सूखी हुयी सी

पास बहती वह नदी |

नियति से बन दो किनारे

पास होकर दूर है

इस तरह रहते दिलो में

न दुआ न बंदगी |

वक्त की चादर तले

ढक गए वह भाव मीठे

तिक्तता ही तैरती है

प्रेम की सूखी नदी |

मन के आँगन में उतरना

चाहती है यादे मधुर

रोक करउनको खडी है

आज रिश्तो की बदी |

डोर उलझी इस कदर

अब तो पराये गांव में

नफरतो की ईमारत

हो रही है जिंदगी |

रुठने को दुनिया पड़ी है

भूलना बस यह कड़ी है

वक्त है तो सोच लेना

प्यार को लघु जिंदगी |

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 28, 2014

डोर उलझी इस कदर अब तो पराये गांव में नफरतो की ईमारत हो रही है जिंदगी | रुठने को दुनिया पड़ी है भूलना बस यह कड़ी है वक्त है तो सोच लेना प्यार को लघु जिंदगी | आदरणीय बाजपेयी जी बहुत सुन्दर भाव भरी रचना ..बड़े बदलाव आ रहे हैं प्रेम ईमानदारी प्राथमिक रिश्ते गायब ही … भ्रमर ५

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 29, 2014

    प्रिय श्री शुक्ल जी बिलकुल सच कहा आपने प्रेम रिश्तो से गायब हो रहा है | शुभकामनाओ सहित

jlsingh के द्वारा
May 27, 2014

बहुत ही सुन्दर कविता और सही सन्देश आदरणीय बाजपेयी जी!

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 29, 2014

    प्रिय श्री जवाहर जी सार्थक अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक धन्यवाद |

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    May 29, 2014

    प्रिय श्री योगेन्द्र जी पोस्ट को सराहने के लिए हार्दिक धन्यवाद |


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